Holi kavita। होली पर हिंदी कविता

रंगों के महापर्व होली की शुभकामनाएं….

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होली लाये प्रेम का,सन्देशा जन मन भरे
हर्षित मन झूमें, लगे मधुमास हो
धरती के सारे रंग,भाव बन सजे ऐसे
जैसे इस बार होली,अपनी ही खास हो..

लाल लगे माथे,शौर्य का प्रतीक बन
पौरुष पराक्रम ,विजय श्री भाल हो
केसरिया त्याग का सन्देशा,जग जन को दे
संयम वैराग्य तप,अपने ये ढाल हो
धरती की अंगड़ाई,हरे की हरियाली फैले
लहराये तृण-तृण,वसुधा का साज हो…

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विद्या का प्रकाश फैल,तिमिर अशिक्षा का हरे
चहुँओर ज्ञान पीले, रंग का पैगाम हो
नीले सज पुरुषार्थ,मान बढ़ जाये
विश्व गुरु फिर अपना, हिंदुस्तान हो…..

श्वेत सजे मन की ,पवित्रता का भाव लेके
चहुँओर शांति,स्वच्छता सद्भाव हो
रंग सारे मिल जाये,दूर हो विषमताएं
विश्वशांति,सद्भाव का,पूरा अब अरमान हो…..

   

World Woman Day । विश्व महिला दिवस पर कविता

विश्व महिला दिवस पर नारी को समर्पित पंक्तियाँ

प्रथम कविता :-

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प्रेम,समर्पण,व्यथा,वेदना
करुणा,पीड़ा,क्रंदन नारी
बहन,बेटियां, माँ और पत्नि
रिश्तों का सब बन्धन नारी ।
भरे स्नेह संस्कार बालमन
बने पूत रघुनन्दन नारी
बने प्रेरणा जब समाज में
रचे पति रामायण नारी ।
राष्ट्रभक्ति को त्याग पुत्र का
पन्नाधाय सा समर्पण नारी
युद्ध भूमि में सैनिक सेवा
बने पूत अभिनन्दन नारी ।

द्वितीय कविता :-

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हे जनयित्री हे मातृशक्ति,
हे स्नेहकरिणी दयाभक्ति
यश कीर्ति मान सब तुझसे ही
तुझसे ही मुझको प्राण मिला
सह गए अनेकों कष्टों को
पर होठों में नित मुस्कान मिला
सच कहता हूं जग की देवी
तुझसे जीवन दान मिला।।

वो रोटी गुथे प्रेम डाल
ममता करुणा के संग साथ
कब से भूखी वो स्वयं रही
पीकर पानी बिता गई रात
अघा गया न जब तक मैं
तब तक रुकती न उनकी हाथ
पड़ गए फफोले हाथों पर
चेहरे न कभी थकान मिली।
सच कहता हु जग की देवी
तुझसे जीवन दान मिली।।

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टिक-टिक करता मेरा बचपन
बन कर रही सदा परछाई
बड़ा हुआ कब कैसे हँसते
ये बात समझ न मेरे आई
दिन-दिन भी कई बरस लगेथे
खुशियो को जो तूने खपाई
बार एक जब भी मैं बोला
हरदम कपड़े नया दिलायी
कितनी सिलवट फ़टी साड़ियां
पहन गई मा कर तुरपाई
छुआ नही माँ मुझे मुसीबत
हरदम नई उड़ान मिला।
सच कहता हूं जग की देवी
तुमसे जीवन दान मिली।।

छत्तीसगढ़ी कहानी “आरो”chhattisgarhi story

## आरो ##

नान्हे-नान्हे लइका लोग बर अड़बड़ मया । पारा गली म सबके सुख-दुख म आघु ले आघु खड़े हो जाय । सब झन बर मयारू रहिन, फेर अपने बर बिरान होगे रहिस ढेला ह।भला बनी-भूति करके पेट पालय । फेर सबो के सुख-दुख के आरो ले । हटरी के दिन खाई खजानी बर लइका मन कलर कलर करे। सबो बर अतीक मया फेर अभागिन ह बेटा-बहु के सुख ल नई पाइस। नान्हें पन म बपुरी के बिहाव बर होगे रहिस । काल के मालिक कोन होथे । एकेच झन बाबू भर निभे रहिस, उँकर जोड़ी ह उँकर संग ल छोड़ सरग सिधारगे। नान्हे लइका के मुहू म पेरा झन गोंजाय कहिके बपुरी ह अपन जिनगी अपन बाबू सुखीराम ल देख के बिता दिन। दिन भर बनी-भूति, गौटिया घर गोबर-कचरा, त ककरो कुटिया-पसिया। जेकर जइसन दया उले दु चार पईसा दे दे।अपन मुंह ल बांध जांगर तोड़ पसीना गारके अपन बाबू बर कोनो कमी नई होवन दिस।बाबू बड़े होइस त उँकर पढ़े-लिखे के घला बेवस्था करिन।

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दिन बीते लगिस बाबू सुखीराम जवान होगे रहिस ।महतारी बेटा दुनो के मेहनत के परसादे अब घर म कोनो किसम के कमी नई रहिस।
अपन जिनगी ल बाबू बर निछावर करके आज के सुघ्घर दिन के सपना मन म सिरजाये रहिस।बाबू के पसन्द ले नोनी देख के उँकर हाथ पिवरा दिन।ढेला ह बाबू के बिहाव म कोनो किसम के कमी नई करिन । गांव वाले मन त देखते रहिगे। का बेंड बाजा, मोतीचूर के लाडू,नचनिया,अउ सगा सोदर। जात बिरादरी के मान गउन म कोनो किसम ले कमी नई आवन दे रहिस।जइसे ढेला ह इही दिन के सपना ल सिरजा के राखे रहिस।”सिरतोन म जेन अभागिन के सरी जिनगी ह हिरदे ल कठवा-पथरा करके अपन जिनगी के एकेच ठिन सपना देखय वहु पूरा हो जाय त मन अघा जाथे।”


उछाह मंगल ले बाबू के बिहा निपटगे अब जइसे ढेला के जिनगी म बड़ जन काम पूरा होगे।नाती -नतरा के सपना सिरजाये लगिस ।फेर कभू-कभू मनखे के खुशी म नजर लग जाथे ।बेटा बहु म खिटीर-पिटिर चालू होगे।बात बढ़े लगिस।उँकर खिट-पिट म रतिहा घर म ढेला सँसो के बादर म बूड़गे।
सियान ह घर म कोनो ऊंच-नीच देख के सीखाए बर दु टपपा कहि परथे तेहा नवा बहु बेटी मन बर भारी हो जाथे।”सियान मन अपन जमाना के रीत ले सकेले अपन ढंग ले साव चेत होवतआगू डहर बढ़ना चाहथे त जवान मन अपन ढंग ले नवा जमाना के सङ्गे संग आगू बढेबर देखथे कभू-कभू पीढ़ी के इही भेद म सुनता-सुमत के बिना डाँड़ खींचा जाथे जेन आज के ऊपर बर भारी परथे।

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इही समय के डाँड़ ह आज ढेला के दुवारी म परगे बहु नवा जमाना के नोनी आय उँकर गांव समाज के लोक लिहाज,अउ कोनो अउ काम ल अपन ढंग ले करेबर ढेला के दु चार बात बहुरिया ल पुचर्री लागे अउ इही बात ल लेके सुखी राम संग खिट-पिट हो जाये।सुखीराम बहुत समझाय के कोशिस करिन फेर ढेला नई मानय ।कोन बइरी कोन हित।पारा परोस के एक दु झन चुगलहिं मन घला अब बहुरिया के कान ल भर दे रहिस।अब बात मुड़ के आगू बड़ गए रहिस दु चार झन हितु -पिरोतु मन के समझाय ले घला बात नई बनिस।बहु ह हांडी सथरा, पोरसे बांटे ल बंद कर दिन। बिहनिया सूत उठ के ढेला ह सुखी राम ल अपन तीर बलइस अउ कहिस:-बेटा तोर गोसईन सन तै बने खा कमा मोर दु चार दिन के जिनगी मैं तुंहर खुसी म आड़ नई बनव। बात आगू बढ़गे रहिस बेटा बर दाई अउ बाई म कोनो ल चुनना बड़का बात रहिस।जेन दाई जिनगी ल उँकर बढवारी म खपा दिस तिरिया के हठ म इही ल छोड़े ल परही विधाता एसनहा दिन कोनो ल झन दिखाये।


बेटा वो तोर बरे बिहई ये,तोर छोड़ वोकर कोन हवय ।अभी मोर जांगर चलत हवय जेन दिन थक जाहु त विहिच तो मोर सरी ल करही अभी मन ल मढावन दे बइही ल ढेला ह सुखीराम ल समझावत कहिस।दु चार सियान मन बेटा बहु ल समझाइस फेर बात नईच बनिस त उँकर बंटवारा होगे सियान मन ढेला ल कहिस तोर जियत ले दु हरिया के खेती त अपन तीर राख विही म तोर जिनगी चलहि।इकर हाथ गोड़ मजबूत है खाय कमाय।फेर ढेला नई मानिस कहिस अब ये उमर म खेती खार म दवा दारू मोर ले नई होवय अउ इंकर ले जोन बोरा खंड मिल जाहि विही म जिनगी चला लेहु।
जेन लइका मन सियान बर थोरको मया नई करिस ओकरो बर कतका मया।सिरतो दाई दाई होथे जिनगी भर देथे अपन हिस्सा के सुख ,मया,पिरित अउ आशीष के छइहाँ देके हमर जिनगी ल भागमनी बना देथे।बदला म वो हमर हिस्सा के दुख ल हाँसत ले लेथे।

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ढेला बनी भूति करके अपन दिन बिताये।बहु ह सुखीराम ल अपन आघु म सियानहीन ले गोठियाय ल घला नई दे।सुखी अउ ढेला के बीच परछी म कोठ खड़े होगे रहिस ।दिनभर के खेती-मजूरी म बेटा बहु ह नवा जमाना के खर्चा ल नई पुर सकय।वोतकी म ढेला ह दू पइसा बचा डरे। बेटा बहु के ऊपर जब कोनो बिपत आतिस के कोठ तीर कान देके आरो लेवत कोनो किसम ले मदद करतिस।हाट बाजार म नाती -नतनीन बर चना फूतेना,लाई-मुर्रा,कांदा-कुसा,लेतिस लइका मन दाई तीर जुरियाबे रहे।झिम झाम देख के सुखी राम दाई तीर आये त उँकर हाथ कभू कोनो जिनिस ल घला ढेला ह भितराउंधि दे दय।


ढेला लोग लइका मन के अतकी च मया दुलार म खुश रहिस।रात दिन के हकर-हकर बूता काम म तन थक गे रहिस अउ संसो के घुना ह मन त खात रहिस एक दिन ढेला बीमार परगे डोकरी खेर-खेर खाँसे अब तो बीमार डोकरी तीर लोग लइका के अवई -जवई घला बंद होगे।बेटा जरूर डॉक्टर के बुला के सूजी-पानी करिन फेर जतन-रतन
खान -पान ढंग ले नई हो पाइस ।

अउ एक दिन रतिहा कोठ के तीर म जठे खटिया म करलई बमलई करत सियानहीँ ह पराण ल तियाग दिन।जइसे वोहर कोठ म बेटा बहु के आरो लेवत समागे।फेर सियानहीँ के आरो कोई नई लीन।बिहाने सबो बिरादरी के म न सकलाइन बहु ह पढ़-पढ़ के रोवत रहय फेर अब ढेला माटी के काया होगे रहिस कहा ल आरो पाहि?

चलो मानवता के लिए एक दीप जलाये


दीप जले
अंधकार चीरकर
मन की पीड़ा दूरकर
उल्लसित मन
सुमन तरंग
ज्योतिर्मय जग में
भीनी सुगन्ध
दीप जले ,दीप जले!

अलसाई खेतों में
मेहनत का प्रतिफल हो
बंगले की आभा से
झोपड़िया रोशन हो
मानवता सजोर रहे
हिन्दू न मुस्लिम हो
माटी का नन्हा लोंदा
हाथों में साथ बढे
दीप जले, दीप जले!

घर की खिचडिया सही
भले न पकवान बने
तरसे न बचपन फिर
भूख न शैतान बने
नन्ही सी बिटिया की
आभा न आंच आये
खुशीयो को अपनी
दूजा न रो पाए
दीप जले,दीप जले!

बम और लरियो की
इतनी न धमाके हो
उजड़े न घर बार कोई
अपनो की यादें हो
सरहद सुकून मिले
अमन का बिसाते हो
हाथ बढ़े, गले मिले
दीप जले, दीप जले!

सहमी सी धरती में
अपनों का क्यो रोना
जीत जाए मानवता
हारे अब कोरोना
चिंतन मन सद्प्रयास
जन मन का साथ मिले
दीप जले-दीप जले…

http://hindimala.com/tag/dronkumar-sarva/

मानसून एक दिन पहले आ गया ।new hindi story 2020

क्या कहा ? मैं एक दिन पहले आ गया । अरे हां भई तो इसमें कौन सा पहाड़ टूट पड़ा । मेरे साथ तो बादलों के , हवाओं के , लंगर - लश्कर साथ में होते हैं ना । क्या कहा मेरी रंगत बदल गई है । बिल्कुल ठीक कहा तुमने , सब कुछ तो बदल गया ।

सैकड़ों वर्षो पहले मेरी मनुहार की जाती थी ।मल्हार राग की रचना करने वाले तानसेन से ही पूछ लो ।कितने प्यार से , लाड़ -दुलार से , मुझे न्यौता दिया जाता था ।

कभी हवन के सुगंधित सामग्रियों की सुगंध द्वारा मुझे रिझाया जाता तो कभी मंत्रोच्चार द्वारा मुझे संदेश भेजा जाता । और मैं भी झूम - झूम कर बरसता था । और कालिदास की " मेघदूत " कृति से मैं संदेशवाहक की भूमिका भी निभाता था।

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देश - काल , समय के अनुसार मुझे भी बदलना पड़ा । मुझे तो बादलों के ढोल - नगाड़ों की थाप पर , पानी की बूंदों का सेहरा बांध वसुधा की पत्तियों पर , शाखों पर , पर्वत - पहाड़ों पर , थिरकना भाता है ।

जब मैं बरसता हूं तो पानी की बूंदों के साथ ताल , तालाब , नदियां , समंदर सभी खुश रहते हैं । अरे मानुष की बात तो छोड़िए , पशु - पक्षी सब प्रसन्न होते हैं । पशुओं की खाल पर से मैं गुदगुदी करते फिसलता हूं तो ऊंचे परवाज वाले पक्षियों के पंखों पर पूरे आकाश भी घूम आता हूं ।

बदलते वक्त के साथ इतना कुछ बदल गया । मेरे राह के साथी घने जंगलों , निरीह वृक्षों को जब काटा गया तो भला मेरा सृजन कैसे होगा ? दुष्परिणाम मेरा उत्पादन कम होता गया ।

पहले तो पग- पग में छोटे- बड़े कानन ,जंगल वृक्ष मेरी अगवानी में खड़े मिलते थे । पहाड़ों के घर मेरा ठौर हुआ करता था । वसुधा के जलवाष्प पहले मेरे घर गर्मियों में छुट्टी मनाने आते हैं , फिर उन्हीं की ठंडक से बादलों की तश्तरी में सजा कर फिर धरती की ओर बारिश के रूप में मुझे परोसा जाता था ।

अहा जब मैं गांव , शहर , खेत - खलिहानों में बरसता हूं तो पूरी धरती धानी चुनर ओढ़ कर शर्माती फिरती है । किसानों के , बैलों के चेहरों की रंगत देखते ही बनती है । मेरी आगवानी में बागों में झूले भी बांधे जाते हैं , और कितनी कागज की कश्तियों को मेरा इंतजार रहता है , यह बच्चों से पूछ लो ।

कितनी नवविवाहिताएं पीहर से संदेश भेजती है । यह उनकी कलाइयों की चूड़ियों से पूछ लो ..... । अरे भई मैं तो सदियों से समय का पाबंद रहा हूं । पर आज मेरी रफ्तार जरा सी तेज करनी होगी ना ।रास्ते में व्यवधान कितने हैं ? अम्लीय वायु मेरे भीतर बिना मेरी इजाजत के आ जाता है और अम्लीय वर्षा के रूप में मैं बदनाम होता हूं ।

हजारों कारखाने से उठते प्रदूषित वायु से मैं खाँस - खाँस कर बेहाल हो जाता हूं । ऊपर से भयानक प्रदूषण जगह-जगह मेरा रास्ता रोके खड़े रहते हैं । बताओ इतनी बाधाओं से भला एक अकेली जान कैसे निपटें ?

गगनचुंबी इमारतें , कटते वन ,कारखानों से निकले धुँए से मेरा जीना दूभर हो गया है । पर मैं अपने कर्तव्य से कैसे मुंह मोड़ मलूँ । मुझे जिस कार्य के लिए सृष्टि ने रचा है उस कार्य को तो मुझे हर हाल में करना ही है ।

मानव जाति गलतियों पर गलतियां किए जा रही है मैं बस खामोशी से सह रहा हूं । और ऊपर से दुनिया जहान के ताने कि मैं बदल गया हूं । खंड वर्षा करता हूं । कहीं अकाल तो कहीं भुखमरी ला रहा हूं । यह सुन - सुन कर मेरी आत्मा छलनी हो जाती है ।

भला मानव जाति जिनका अस्तित्व मेरे से ही है तमाम इतिहास , संस्कृतियों का गवाह और उद्गम स्रोत मैं हूं यह जान कर भी क्या मैं वादा खिलाफी कर सकता हूं ? मेरा पोर - पोर अब दुखने लगा है । मैं तो सृष्टि के प्रारंभ से ही अपना कार्य करता आया हूं पर अब इतनी थकान , अरुचि जो अभी हो रही है वैसी पहले कभी नहीं हुई थी ।

जहरीले हवा वातावरण में घुली हो ऐसा ही नहीं है अब तो मेरे ही बच्चों की शहादत वाले बारूद की गंध मेरी शरीर में नासूर की तरह चुभ रहे हैं । कहीं आतंकवाद तो कहीं नक्सली बारूदों का प्रयोग कर रहे हैं ।

मानुष गंध , चीथड़ों के कण , हजारों यतीम बच्चों के उदास आंखें , शहीदों के मांओ के " आंसू से रिक्त आँखे " उन सबके चुभते प्रश्नों का सामना करते - करते मैं थक चुका हूं । सिर पकड़ कर बैठे किसानों के कुम्हलाये चेहरे मुझे रुला देते हैं । पर मेरे आंसू कहां सबको दिखते हैं ? वो तो बारिश में भूल जाते हैं ।

अब तो मेरी तासीर नाली में बहते पानी जैसे हो गई । पर मैं तुरंत उठता हूं पूरे जोश के साथ , बादलों के लंगर लश्करों के साथ , तमाम शहीदों के खून से रंगी वादियों , किसानों की उदासी , तालाबों की मायूसी , पशुओं की पीड़ा , पेड़ों के अंतरनाद , मानव जाति के चित्कार , इन सब को धोने की उनके चेहरों पर फिर से खुशहाली दिख जाए इसी आशा के साथ मैंने अपनी रफ्तार बढ़ा दी है । तभी तो एक दिन पहले आ पहुंचा हूं । और लोग कहते हैं कि मानसून एक दिन पहले आ गया ।