NEW HINDI KAVITA कब तक और सहोगे यारों…..

हमने भेजा वहां कबूतर , उनके गोलों का पैगाम ,

और हिलाओ हाथ साथ में , झेलो अपनी करनी का परिणाम ,

अपने फूलों के गुलदस्तों  का , आतंकी उपहार दिया ,

 हमने तो अपना हक मांगा था , पर उल्टा गला कटार दिया ,

 उठो चलो बस मुट्ठी बांधो , दुश्मन पर तुम वार करो ,

 कब तक और रहोगे यारों , अब तो ठोस  प्रहार करो ।।

 अरे अपने भी भाई हुसैन है, अपने घर भी मुल्ले हैं ,

मियाँ जी के घर पर दिवाली में , मिश्रा के रसगुल्ले हैं , 

और सेवईयाँ बँटी ईद पर , शर्मा और चौहानों में ,

अपना मजहब भले अलग पर,  प्रेम बसा गीता और कुरान में,

अरे पशुता कि अब राह छोड़ , इंसानी व्यवहार करो ,

कब तक और रहोगे यारों ,अब तो ठोस प्रहार करो ।।

 हिम्मत है तो आगे आओ,  क्यूं कवच बनाकर लड़ते तुम ,

कुछ पैसों के गुंडों से , कितने अबोध कुचलते तुम,

 कान खोलकर सुनो ध्यान से , है कश्मीर हमारा ताज ,

हम अखंड है सदियों से , और न खंडित होंगे आज ,

अपना घर ना संभलता तुमसे ,अरे शरीफों व्यर्थ न प्रयास करो,

कब तक और सहोगे यारों , अब तो ठोस प्रहार करो ।।

 अरे ढूंढो अब तुम घात लगाकर , अपने घर के गद्दारों को ,

उससे तो अच्छी वेश्याएँ भूख मिटाती ,

सौदे तन का ,नहीं देश दीवारों का , 

कब तक झूठे शान के खातिर इतना तुम इतराओगे ,

कितनी लाशों पर आंख बहा , मां बहन बेटियों की भावों संग ,

उजड़ी माँग दिखाओगे ,

अब धाराएं मोड़ सिंधु की , इनको ले लाहौर चलो ,

कब तक और सहोगे यारों , अब तो ठोस प्रहार करो ।।

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