Bhoramdev tample kawardha_भोरमदेव का मंदिर छत्तीसगढ़

नमस्कार साथियों , आज मैं आपको छत्तीसगढ़ के एक प्रसिद्ध स्थल भोरमदेव के बारे में बताने जा रहा हूँ ।

भोरमदेव का मंदिर 

छत्तीसगढ़ का सर्वाधिक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल है । यह वर्तमान कवर्धा जिले में स्थित एक मंदिर है , जिसे छत्तीसगढ़ का खजुराहो भी कहा जाता है । यह मंदिर जिला मुख्यालय से 18 किलोमीटर दूर  उत्तर पश्चिम की तरफ चौरागांव नामक जगह पर स्थित है । यहां पर प्राचीन काल में फनी नागवंशी राजाओं का शासन था । भोरमदेव मंदिर की उत्कृष्ट कला शिल्प और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह एक महत्वपूर्ण शिव मंदिर है ।
BHORAMDEV MANDIR
                                                                                दंत कथा के अनुसार गोंड राजाओं के देवता भोरमदेव थे , जो कि भगवान शिव जी का ही एक रूप है (बूढ़ा देव )  इसलिए इस मंदिर का नाम भोरमदेव रखा गया होगा । मंदिर के मंडप पर बैठे एक दाढ़ी –  मूंछ वाले योगी की मूर्ति में उकेरे गए लेख के अनुसार इस का समय कल्चुरी संवत 840 अंकित किया गया है। इस मंदिर का निर्माण 11 वीं शताब्दी में सन 1089 संवत 840 में राजा गोपाल देवराय ने कराया था । मंदिर का मुख पूर्व दिशा ओर है मंदिर में तीन प्रवेश द्वार है ,जिससे सीधे मंडप तक प्रवेश कर सकते हैं । मंदिर 5 फीट ऊँचेे चबूतरे पर बनाया गया है । मंडप की लंबाई लगभग 60 फीट और चौड़ाई लगभग 40 फीट है । मंडप के बीच में 4 खम्भे भी है तथा बाहरी किनारे पर 12 खम्भे हैं ।
                                                                                                                                                                          मंडप में लक्ष्मी , विष्णु एवं गरुड़ की मूर्ति है तथा ध्यानमग्न  एक योगी राजपुरुष की प्रतिमा भी रखी गई है।  गर्भगृह के मध्य में काले पत्थर से बना हुआ एक शिवलिंग स्थापित किया गया है । साथ ही गर्भगृह में एक पंचमुखी नाग तथा गणेश जी की नृत्य करती हुई प्रतिमा स्थापित की गई है , वहीं पर पास में ही उपासना रत स्त्री – पुरूष की प्रतिमा भी स्थापित की गई है । भोरमदेव मंदिर नागर शैली में बनाया गया  , हिन्दू स्थापत्यकला का एक अद्भुत नमूना है । मंदिर के बाहर अति मनमोहक चित्र उकेरे गए हैं , जिसमें मिथुन मूर्तियां , हाथी – घोड़े ,नृत्यरत स्त्री-पुरुष , गणेशजी ,  नटराज आदि की मूर्तियां स्थित हैं । भोरमदेव अपनी कला और शिल्प के लिए विश्व विख्यात है , यहां दूर-दूर से लोग इस कला को निहारने के लिए आते हैं ।
MADWA MAHAL

भोरमदेव के आसपास अनुपम सौंदर्य , घने जंगल , पहाड़ और झील है । भोरमदेव मंदिर से कुछ दूरी पर एक और प्रसिद्ध मंदिर है , जिसे मड़वा महल कहा जाता है । यह वर्तमान समय में खंडित अवस्था में है,  इसकी बाहरी दीवारों पर भी मिथुन मूर्तियां बनाई गई हैं ।गर्भगृह की छत काले चमकदार पत्थरों से बनी है । यहां से प्राप्त शिलालेखों से ज्ञात होता है कि मड़वा महल का निर्माण भी चौदहवीं शताब्दी में हुआ था । यह संभवतः  नाग वंश के राजा रामचंद्र ने हैहयवंशी राजकुमारी अंबिका देवी से विवाह किया था इसी समय इस महल का निर्माण किया गया होगा ऐसा इतिहासकारों का कहना है ।

                                                                                 भोरमदेव मंदिर जितना प्रसिद्ध अपने शिल्पकला के लिए है , उतना ही प्रसिद्ध प्राकृतिक सुषमा और सौंदर्य के लिए भी है । यहां पर आकर लोग अति आनंद का अनुभव करते हैं । यह छत्तीसगढ़ का एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है,  यहां पर हर साल लाखों पर्यटक अलग-अलग राज्यों से और विदेशों से आते हैं । यहां पर पास ही में भोरमदेव वन अभ्यारण्य भी है , जहां पर अनेक प्रकार के जीव  – जंतु , बाघ, हाथी ,हिरण और अनेक प्रकार के जीव- जंतु ,पक्षी आदि देखने को मिलता है । यहां की मैथुन मूर्तियों को देखकर ऐसा लगता है कि प्राचीन काल में भारत देश के आदिवासी कितने खुले विचार क थेे वे लोग अपने जीवन की कलाओं को संपूर्ण रूप में प्रदर्शित करते थे , बिना किसी शर्म के ।
               आशा करता हूँ , साथियों आपको यह लेख पसंद आया होगा अपने विचार हमें कॉमेंट बॉक्स में जरूर बताये तथा हमारी अन्य पोस्टों को भी जरूरत पढ़े ।
                                                                               @@ धन्यवाद@@

सोने का फल

बहुत पहले की बात है ,एक छोटा सा गांव था, उस गांव के लोग खेती किसानी का काम करते थे । जिनके पास खेत नहीं होता था , वे भेड़ ,बकरी और गाय -भैंस चराने का काम करते थें ।  दूध ,दही , गोबर और कंडे बेचकर वे अपना गुजर बसर करते थे । उसी गांव में सुखराम नाम का आदमी रहता था , उसके पास खेत नहीं था । उसके पास बहुत सारी बकरियां थी , हरदिन वो उन्हें जंगलों में ले जाकर चराता था , और शाम होने पर अपने गांव लौट अाता था । बकरियां जंगल में जाकर , हरे-हरे पत्ते और घास को खाकर उछल-कूद करते हुए घर को लौट आती थी । 1 दिन की बात है , सुखराम अपनी बकरियों को लेकर जंगल में बहुत दूर निकल गया जेठ का महीना था । सूर्य की किरणें आग की तरह तप रही थी , गर्मी के कारण बहुत धुल उड़ रही थीं । जमीन भी कोयले की अंगारों जैसा प्रतीत हो रहा था । उसके आसपास पानी का कोई स्त्रोत नहीं था , सुखराम को बहुत प्यास लग रही थी । सुखराम प्यास के कारण  वही एक पेड़ के नीचे तड़पने लगा ।  बकरियां उसी के आसपास फैल कर चरने लगी , कुछ समय पश्चात भगवान श्री शंकर महादेव वहां पर आए और उन्होंने सुखराम को प्यार से तड़पते हुए देखा । भगवान श्री शंकर ने एक ऋषि का वेश धारण किया और अपने हाथ के कमंडल में पानी लेकर उसके पास पहुंच गए ।ऋषि ने पूछा क्यों सुखराम तुम क्यों तड़प रहे हो  ? सुखराम ने कहा – क्या बताऊं महाराज प्यास के मारे मेरे प्राण निकल रहे हैं । भगवान शंकर को उस पर दया आ गई , उन्होंने अपनी कमंडल का पानी सुखराम को पीने के लिए दिया और अपनी थैले से निकालकर कुछ फल सुखराम को खाने के लिए दे दिया । सुखराम ने कुछ फल खाया और पानी पिया । सुखराम का मन शांत हुआ और उसने बचा हुआ फल अपनी पोटली में रख दिया । दिन भर में थका हुआ सुखराम साँझ होने पर घर को लौटने लगा । घर लौटने पर उसने अपनी पत्नी सुखिया से बातचीत की और बचा हुआ फल रसोईघर के पाट के ऊपर रख दिया । रात में खाना खाने के बाद वह लोग सो गए , सुबह अगले दिन मुर्गे की बांग के साथ उसका नींद खुल गया । हाथ मुंह धो कर सुखराम रसोईघर में गया और पाट में रखे हुए फल को देखा । फल को देखकर वह सन्न रह गया साधु के दिए हुए फल सोने के बन गए थे , उसने उस फल को चुपचाप कपड़े में लपेट कर और बकरियों को लेकर जंगल की ओर चला गया । सुखराम मन ही मन बहुत बहुत गदगद हो रहा था , लेकिन कभी-कभी उसके चेहरे पर डर के भाव भी दिखाई दे रहे थे । दिनभर बीतने के बाद शाम को वह फिर घर आया । उसके बाद खाना खाकर सो गया , लेकिन रात भर उसे नींद नहीं आई । दूसरे दिन सुबह – सुबह ही वह उठ गया और अपनी पत्नी को कहा कि आज मुझे शहर में कुछ काम है ।  मैं आज जंगल में बकरी चराने नहीं जाऊंगा , आज तुम चली जाना । सुखिया ने जल्दी –  जल्दी घर का काम किया खाना खाया और बकरियों को लेकर जंगल की ओर निकल गई । सुखराम भी अपनी पोटली पकड़कर शहर की तरफ चला गया । शहर में पहुंचने के बाद सुखराम जल्दी-जल्दी एक सुनार के दुकान पर पहुंचा और उसने अपनी पोटली से सोने का फल निकालते हुए सुनार को दिया । सुनार चमचमाते सोने के फल को देखकर चकित रह गया । उसके मन में लालच आने लगा उसने पूछा इसे तौलना है क्या ? सुखराम ने झट से कहा – हां भैया इसे जल्दी से तौल दो और मुझे पैसा दे दो । सोनार ने सोने के फल को तराजू पर रखा और उसे रुपयों की गड्डी थमा दी । सुखराम ने कुछ भी सवाल जवाब नहीं किया और उल्टे पांव अपने घर वापस आ गया । इतने सोने की कम भाव देकर सुनार बहुत खुश हुआ और उसने सुखराम को कहा कि मेरे पास दोबारा जरूर आना , मैं पूरे शहर में तुमको सबसे अच्छा भाव दूंगा । सुखराम ने घर आकर सारी बात अपनी पत्नी सुखिया को बताई और रुपयों को गड्डी उसके हाथों पर रख दी । उसके बाद उन्होंने अपने घर के लिए नए-नए बर्तन खरीदें , नए कपड़े खरीदी , सुखिया ने अपने लिए बहुत से महंगे – महंगे जेवर  खरीदी । बहुत सारी बकरियां खरीदी और कुछ दिनों में उन्होंने अपने लिए एक बड़ा सा सुंदर घर बनवा लिया , उनकी इस अमीरी को देखकर गांव में चर्चा होने लगी कि यह लोग कुछ ही दिनों में इतने अमीर कैसे हो गए । दोनों बहुत बोले थे उन्होंने लोगों के बार बार पूछने पर बता दिया तथा अपनी सच्चाई को साबित करने के लिए वह सोने का फल भी लोगों को दिखा दिया । एक दिन उनके घर पर चार लोग आए और उन्होंने कहा हमने आपके बारे में बहुत कुछ सुना है ,क्या आप लोग सच बोल रहे हैं ? हम वो सोने का फल देखना चाहते हैं । क्या आप जो कह रहे हैं ,  वह वाकई सच है ? सीधे – साधे सुखराम ने उन चारों को सोने का फल दिखाकर पूरी कहानी बता दी । उसी रात  को उनके घर में चोर घुस आए , उन्होंने सुखराम के सोने के फल को चुरा लिया लेकिन खटपट की आवाज होने पर सुखराम की नींद खुल गई और उन्होंने उन चोरों को पहचान लिया , कि यह वही लोग है जो सुबह फल के बारे में पूछने के लिए आए थे । गांव में सुखराम के घर चोरी होने का हल्ला मच गया था । सुखराम सुबह-सुबह ही पंचायत में पहुंच गया और उसने सारी बात बता दी पंचायत ने उन चारों लोगों को बुलाया और पूछा कि क्या तुमने सुखराम के सोने का फल चुराया है  ? उन लोगों ने चोरी करने की बात स्वीकार नहीं की लेकिन पंचों के धमकाने के बाद वे डर गए और उन्होंने चोरी करने की सारी बात पंचायत के सामने कबूल कर ली । चोरों को चोरी किया हुआ फल लाने के लिए कहा गया उनमें से एक गया और छुपाया हुआ सोने का फल पोटली सहित लेकर आ गया । पंचों ने उस पोटली को खोल के देखा तो उसमें कच्चे फल थे । यह देखकर सभी आश्चर्यचकित हो गए । उन फलों को सुखराम को वापस कर दिया गया और चोरों को गांव से बाहर निकाल दिया गया । सुखराम वह फल देखकर निराश हुआ और अपनी पत्नी के साथ घर वापस आ गया , उसने वह फल वापस रसोईघर के पाट के ऊपर रख दिया । लेकिन यह क्या,  वह फल फिर से चमचमाते हुए सोने के फल में बदल गए यह देखकर सुखराम और सुखिया बहुत खुश हो गए और खुशी से नाचने लगे ।

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Jokes

1.
परीक्षा मे फेल होने की वजह पुछी गई तो जवाब दिया, आज के होनहार छात्र ने ??
1 साल के 365 दिन होते हैं……
रोज 8 घंटे सोने के यानी पुरे साल के 122 दिन
*365-122=243*
और गर्मी की छुट्टी गीनो 61 दिन
*243-61=182*
उसमे 52 दिन रविवार
*182-52=130*
दिपावली, होली इत्यादि पर्व की 40 दिन
*130-40=90*
काॅलेज फेस्टिवल 15 दिन
*90-15=75*
खाने-पीने, नहाने के 3 घंटे की हिसाब से 46 दिन
*75-46=29*
रोज के 1 घंटे दोस्तों की उसका 15 दिन
*29-15=14*
अब हम 10 दिन तो बीमार भी रहते हैं
*14-10=4*
टीवी देखने के 3 दिन
*4-3=1*
1 साल मे 1 दिन ही तो जन्मदिन आता है अब जन्मदिन के दिन कौन पढता है यार……
Parent’s Shocked Student’s Rocked………..
😀😀😀😀😀
😝😝😝
 2.
पप्पु – यार बिटु मेरा रिजल्ट तु देख के आजा !
अगर एक Subject मेँ फेल हुआ तो बोलना “जय श्री राम”. . . .
अगर दो मेँ फेल हुआ तो बोलना “राधे राधे” . . . .
अगर तीन मेँ फेल हुआ तो बोलना
“ब्रम्हा विष्णु महेश”
बिटु – (result निकलवाकर )
पप्पु – क्या हुआ ?
बिटु – बोलो साँचे दरबार की जय ।।।
 😂😂😂😂              सब में फेल😂
3.
शिक्षक ने गलती से दूसरे के मोबाइल नंबर पर बैलेंस डलवा दिया,
जब गलती का अहसास हुआ तो उसे सैकड़ो फोन कॉल कर डाली ,
पर फोन न उठा ।
शिक्षक ने मैसेज किया “लश्करे तालिबान में आप का स्वागत है,
बैलेंस स्वीकार कर आप हमारे मेम्बर बन गए है ,
सतर्क रहियेगा सरकारी एजेंसिया आप पर नजर रखे है ,
संभल कर फोन इस्तेमाल करियेगा”
 तुरन्त घबराया हुआ उसका फ़ोन आया की यह क्या माजरा है?
शिक्षक ने फ्री में सलाह दे दी कि बैलेंस वापस कर मेम्बर शिप कैंसल हो जायेगी,
 बस फिर क्या था थोड़ी देर में पैसा वापस आ गया।
शिक्षा:-
1- शिक्षक की सलाह कभी फ्री नही होती।😉
2- शिक्षक का पैसा कभी हजम नही होता।😜
😂😂😂😂😂😂😂😂😂
4.
एक मास्टर जी के घर मे 7-8 मास्टर मेहमान आ गए…
मास्टर जी की बीवी बोली, “घर मे चीनी नहीं है, चाय कैसे बनाऊँ?”
मास्टर ने कहा, तुम सिर्फ चाय बनाकर ले आओ, बाकी मै सम्भाल लूंगा “.
बीवी चाय बनाकर ले आई।
मास्टरजी ने कहा,” जिस के हिस्से में फिकी चाय आएगी,
कल हम सब उनके घर मेहमान बनकर खाने के लिए आएंगे “
सभी मास्टरों ने खुशी से चाय पी ली। एक ने तो यहाँ तक कह दिया,
“मेरी चाय मे तो इतनी चीनी है,कि डर है कहीं डायबिटीज ना हो जाए……!!!
मास्टर ताे मास्टर ही हाेता है भाई साब  !!!
5.
✂✂✂✂✂✂✂✂
👩एक महिला को
🏬 मुंबई में नौकरी मिल गई।
👌वह अकेली ही
💝नौकरी ज्वाइन करने पहुंची,
🎁वहां कंपनी ने उसे
⛺रहने के लिए एक फ्लैट भी दे दिया।
😅महिला ने सोचा कि
👨अपने पति को सूचना दे दूं
🎄ताकि उन्हें चिंता न हो,
🎄उसने पति के लिए मोबाइल में
🎄एसएमएस लिखा
🎄परन्तु गलती से
🎄गलत नंबर पर भेज दिया।
🎄जिस आदमी को
🎄वह एसएमएस मिला
🎄उसकी पत्नी गुजर गई थी
🎄और वह अभी-अभी
🎄अंतिम संस्कार करके लौटा था।
🎄एसएमएस पढ़ते ही
🎄वह आदमी बेहोश हो गया और
🎄उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
🎄एसएमएस में लिखा था –
🎄मैं सही-सलामत पहुंच गई हूं
🎄और यहां रहने के लिए
👍अच्छी जगह भी मिल गई है…..
✋आप बिलकुल चिंता मत करना
🌞बस 1-2 दो दिन में ही
😋आपको भी बुला लूंगी।
👩आपकी पत्नी
😄अकेले ही हँसोगे या दोस्तों को भी
👉हसाओगे तो फॉरवर्ड करिए..

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती ।
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है ,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है ,
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना ,गिरकर चढ़ना ना अखरता है,
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती ।
 डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है ,
जा – जाकर खाली हाथ लौट कर आता है  ।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में ,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में ,
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती ,
कोशिश करने वालों की हार नहीं  होती।
असफलता एक चुनौती है ,स्वीकार करो ,
क्या कमी रह गई देखो और सुधार करो ,
जब तक ना सफल हो , नींद चैन को त्यागो तुम ,
संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम ।
कुछ किए बिना ही जय – जयकार नहीं होती ,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती । 
                                                                         हरिवंश राय बच्चन

महापुरुषों का बचपन

                                                                                           महापुरुषों के प्रेरक प्रसंग

                                                                " शाहजी " अपने आश्रयदाता बीजापुर के सुल्तान के दरबार में जाने की तैयारी कर रहे थे , उनके मन में विचार आया क्यों ना शिवा को भी आज अपने साथ ले चलो | आखिर उसे भी तो एक ना एक दिन , इसी दरबार में नौकरी करनी है , दरबार के नियम कायदों का ज्ञान भी उसे होगा  |उन्हेंने आवाज लगाई शिवा तुझे भी आज मेरे साथ दरबार में चलना है | जल्दी तैयार हो जा पिता के आज्ञाकारी पुत्र ने आदेश सुना वह तुरंत तैयार हो गया , पिता पुत्र दोनों दरबार में पहुंचे | शाह जी ने सुल्तान के सामने झुक कर तीन बार कोर्निश किया , फिर वह अपने पुत्र की ओर मुड़ कर बोले बेटे यह सुल्तान है , हमारे अन्नदाता है , इन्हें प्रणाम करो |लेकिन निडर बालक ने कहा पिताजी मेरी पूजनीय तू मेरी मां भवानी है , मैं तो उन्हीं को प्रणाम करता हूं | पिता ने पुत्र की ओर आंखें तरेर कर देखा फिर सुल्तान को संबोधित करते हुए बहुत विनम्र स्वर में कहा - हुजूर यह अभी बच्चा है , दरबार के तौर-तरीके नहीं जानता , इसे माफ कर दीजिए | घर लौट कर जब पिता ने अपने पुत्र को उसके व्यवहार के लिए डांटा , तो उसने फिर कहा - पिताजी , माता ,पिता ,गुरु और मां भवानी के अलावा यह सिर और किसी के आगे नहीं झुक सकता |निडर बालक की बात सुनकर पिताजी सन्न रह गए | यही बालक आगे चलकर छत्रपति शिवाजी महाराज के रूप में प्रसिद्ध हुए ।

                                                                                                                                  प्रसंग दूसरा

                                                                  स्कूल में कक्षाएं लग रही थी , निरीक्षण के लिए शिक्षा विभाग के निरीक्षक आने वाले थे | नियत समय पर आए , एक कक्षा में विद्यार्थियों को उन्होंने 5 शब्द लिखने को दिए , उनमें से एक शब्द था कैटल , मोहन ने यह शब्द गलत लिखा | अध्यापक ने अपने बूट से ठोकर देकर इशारा किया कि , आगे बैठे लड़के की स्लेट देखकर शब्द ठीक कर ले | मोहन ने नकल नहीं किया , वह तो सोचता था की परीक्षा में अध्यापक इसलिए होते हैं कि , कोई लड़का नकल ना कर सके | मोहन को छोड़कर सब लड़कों के पांचों शब्द सही निकले , उस अध्यापक  भी नाराज हुए लेकिन उसने दूसरों की नकल करना कभी ना सीखा |यही बालक मोहन आगे चलकर मोहन दास करम चंद गाँधी अर्थात हमारे राष्ट्र पिता महात्मा गांधी के रुप में जाने गए।

                                                                                                                                   तीसरा प्रसंग

विद्यालय लगा था , लेकिन एक कक्षा में कोई शिक्षक नहीं थे , उस कक्षा के कुछ विद्यार्थी बाहर टहल रहे थे , कुछ कक्षा में बैठे मूंगफली खा रहे थे | वह मूंगफली के छिलके वही कक्षा में फेंक रहे थे ; शिक्षक कक्षा में आए और कक्षा में मूंगफली के छिलके बिखरे देखकर बहुत क्रोधित हुए  |उन्होंने पूछा कक्षा में मूंगफली के छिलके किसने फैलाए हैं किसी विद्यार्थी ने कोई जवाब नहीं दिया शिक्षक ने दोबारा वही प्रश्न कठोरता से किया किंतु फिर भी किसी छात्र ने कोई उत्तर नहीं दिया अब की बार शिक्षक ने हाथ में बैग लेकर कहा अगर सच सच नहीं बताया तो सबको मार पड़ेगी एक छात्र के पास पहुंचे और उससे बोले मूंगफली के छिलके किसने ठेके है जी मुझे नहीं मालूम छात्र ने उत्तर दिया सटक सटक दो भेद उसके हाथ में पड़े छात्र तिलमिलाकर रह गया शिक्षक दूसरे तीसरे चौथे छात्र के पास पहुंचे सभी से वही प्रश्न किया सभी का उत्तर था मुझे नहीं मालूम सबके हाथों पर सटक सटक की आवाज हुई अब शिक्षक पांचवें छात्र के पास पहुंचे उससे भी वही प्रश्न किया छात्र ने उत्तर दिया श्रीमान जी ना मैंने मूंगफली खाई ना छिलके फेंके मैं दूसरों की चुगली नहीं करता इसलिए नाम भी नहीं बताऊंगा मैंने कोई अपराध नहीं किया इसलिए मैं मार भी नहीं खाऊंगा शिक्षक छात्र को लेकर प्रधानाध्यापक के पास पहुंचे प्रधानाध्यापक ने सारी बात सुनकर बालक को विद्यालय से निकाल दिया बालक ने घर जाकर पूरी घटना अपने पिताजी को सुनाई दूसरे दिन पिताजी वाला को लेकर विद्यालय में पहुंचे तेजस्वी पिता ने प्रधानाध्यापक से कहा मेरा पुत्र सत्य नहीं बोलता वह घर के अतिरिक्त बाजार की कोई चीज भी नहीं खाता उसका आचरण बहुत संयमित है मैं अपने पुत्र को आपके विद्यालय से निकाल सकता हूं किंतु निरपराध होने पर उसे दंडित होते नहीं देख सकता प्रधानाध्यापक शांत हो गए यही बालक आगे चलकर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के नाम से प्रसिद्ध हुआ उन्होंने नारा दिया था स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूंगा