Holi kavita। होली पर हिंदी कविता

रंगों के महापर्व होली की शुभकामनाएं….

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होली लाये प्रेम का,सन्देशा जन मन भरे
हर्षित मन झूमें, लगे मधुमास हो
धरती के सारे रंग,भाव बन सजे ऐसे
जैसे इस बार होली,अपनी ही खास हो..

लाल लगे माथे,शौर्य का प्रतीक बन
पौरुष पराक्रम ,विजय श्री भाल हो
केसरिया त्याग का सन्देशा,जग जन को दे
संयम वैराग्य तप,अपने ये ढाल हो
धरती की अंगड़ाई,हरे की हरियाली फैले
लहराये तृण-तृण,वसुधा का साज हो…

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विद्या का प्रकाश फैल,तिमिर अशिक्षा का हरे
चहुँओर ज्ञान पीले, रंग का पैगाम हो
नीले सज पुरुषार्थ,मान बढ़ जाये
विश्व गुरु फिर अपना, हिंदुस्तान हो…..

श्वेत सजे मन की ,पवित्रता का भाव लेके
चहुँओर शांति,स्वच्छता सद्भाव हो
रंग सारे मिल जाये,दूर हो विषमताएं
विश्वशांति,सद्भाव का,पूरा अब अरमान हो…..

   

चलो मानवता के लिए एक दीप जलाये


दीप जले
अंधकार चीरकर
मन की पीड़ा दूरकर
उल्लसित मन
सुमन तरंग
ज्योतिर्मय जग में
भीनी सुगन्ध
दीप जले ,दीप जले!

अलसाई खेतों में
मेहनत का प्रतिफल हो
बंगले की आभा से
झोपड़िया रोशन हो
मानवता सजोर रहे
हिन्दू न मुस्लिम हो
माटी का नन्हा लोंदा
हाथों में साथ बढे
दीप जले, दीप जले!

घर की खिचडिया सही
भले न पकवान बने
तरसे न बचपन फिर
भूख न शैतान बने
नन्ही सी बिटिया की
आभा न आंच आये
खुशीयो को अपनी
दूजा न रो पाए
दीप जले,दीप जले!

बम और लरियो की
इतनी न धमाके हो
उजड़े न घर बार कोई
अपनो की यादें हो
सरहद सुकून मिले
अमन का बिसाते हो
हाथ बढ़े, गले मिले
दीप जले, दीप जले!

सहमी सी धरती में
अपनों का क्यो रोना
जीत जाए मानवता
हारे अब कोरोना
चिंतन मन सद्प्रयास
जन मन का साथ मिले
दीप जले-दीप जले…

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शहीदों को नमन

नक्सली हमले में शहीद देशभक्तों को विनम्र श्रद्धांजलि,


कहीं टिटकता घोड़ा रूठा, कहीं रेशम का धागा
कहीं टूटा बुढ़ापे का लाठी,कहीं सुहाग विधाता
किसी मित्र ने साथी खोया,कहीं किसी ने भ्राता
दुख का अंत कहाँ रिश्तों में ,ससुर हुए बिन जमाता
मचा तबाही फिर दुष्टो की ,नक्सलमयि अंजाम
दण्डक वन की पीड़ा हरने,फिर आओ श्रीराम।।

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मानव ही मानव को छलते है,असन्तोष फिर छाये
तनिक स्वार्थ के चलते हमने,अनगित प्राण गंवाये
उजड़े-उजड़े घर बार यहाँ, खुद को खुद ही तलाश रहे
जल जंगल जमी हमारी ,फिरभी टुकड़ो को ताक रहे
भोली भाली वा-नर सेना का ,यह विकृत अंजाम
दण्डक वन की पीड़ा हरने,फिर आओ श्रीराम।।

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खर दूषणमयि आतंकों से, वनांचल आजाद करो
मरीचि छद्मवेश से ,अब तो पर्दाफाश करो
नुक्ताचीनी राजनीति ने, अब तक बंदरबाट किया
राम राज्य की मूल मंत्र से,धरती और आकाश भरो
जन-जन की अभिलाषाओं के एकमात्र तुम धाम
दण्डक वन की पीड़ा हरने,फिर आओ श्री राम।।

 

New hindi kavita । कविता संग्रह । रजनी शर्मा बस्तरिया रायपुर छत्तीसगढ़

तुम जैसा पुरुष


…………………………………
कैसे जान जाते हो तुम,
कि मेरी साईकिल की
घंटी नही बज रही है……..
और मेरी गुड़िया की
टांग टूट गई है………….,..
मेरी स्कर्ट की सिलाई,
उधड़ गई है………… .. …
और मन के मुंडेर पर,
मौसम छाप छोड़े ,
जा रहा है …………………
पुरुष का प्रथम परिचय भी,
मैंने तुमसे ही पाया…….
हर स्त्री के भीतर ,
एक पुरुष होता है।
हां मैं बनना चाहती हूं,
तुम जैसा ही………….

स्मित


………….. ………………..
जीवन रस की प्याली में,
दुलार तुम्हे पिला रहा हूं।
माटी के बिछौने में बैठ कर,
गोदी में तुमको झुला रहा हूं।
जब तुम हो जाओगे सबल,
बांहों में तुमको थाम रहा हूं।
झंझावातों से भरे जीवन में,
जिजीविषा की लोरी सुना रहा हूं।
लिख लेना खुद किस्मत अपनी,
आस भरे स्मित से समझा रहा हूं।।

New hindi kavita। नई इबारत लिख जाना

नई इबारत लिख जाना


कल थामा था जहां हमारा हाथ,
माउस, कीबोर्ड के संग हो लेना ।
मानीटर में चमकते अक्षरों के साथ,
आंखों की स्लेट में सपने लिख लेना।
बदलते वक़्त की अब मानकर
बात,
नवप्रयास की अगुआई तुम
ही कर लेना।

जब कभी शिखरों पर गर हो
तुम्हारी चढ़ान,
नींव के पत्थरों को भी याद जरा
कर लेना ।
मन आकुल, व्याकुल होकर जब
जाये थक,
दे आवाज़ सधिकार हमें पुकार
ही लेना ।
साहस के बस्ते में ज्ञान के
साथ,
भविष्य की नई इबारत लिख
जाना ………. ।