एकता का बल हिंदी कहानी

                                                                                                                           नमस्कार साथियों आज मैं आपको हिंदी की एक रोचक कहानी ” एकता का बल ”  के बारे में बताने जा रहा हूं , जिसे पढ़कर आपको बहुत ही आनंद आएगा ।

एक जंगल में एक चूहा और एक कबूतर रहता था , दोनों बहुत अच्छे मित्र थे । कबूतर और चूहे की दोस्ती को देखकर किसी को भी समझ नहीं आता था कि , एक  जमीन के अंदर रहता है और दूसरा पेड़ के ऊपर । फिर भी इन दोनों में इतनी गहरी दोस्ती कैसे है  । यह देख कर एक दिन एक कौवा उनके पास जाता है , और कहता है कि , आप लोग मुझे भी अपना दोस्त बना लो ।मैं आप लोगों को बहुत पसंद करता हूं , और मैं आपके सहयोग के लिए हमेशा तैयार रहूंगा ।
                                                 यह बात सुनकर चूहे ने कहा कि कौवा और चूहे की  दुश्मनी तो आदि – अनादि काल से चली आ रही है । भला चूहे की दोस्ती कौंवे से कैसे हो सकती है । कौवा, चूहे का जानी दुश्मन होता है , हम तुम पर कैसे विश्वास कर ले । यह बात सुनकर कौवा गिड़गिड़ाने लगा कि अगर तुम लोगों ने मुझे अपना दोस्त नहीं बनाया तो मैं , बिना कुछ खाए पीए ही अपने प्राण त्याग दूंगा । कौवे के बहुत मनाने और बार बार विश्वास दिलाने पर कबूतर ने कहा कि चलो एक बार हम इसका विश्वास कर लेते हैं , और इसे अपना दोस्त बना लेते हैं । इस तरह कौवा , कबूतर और चूहा तीनों दोस्त बन गए । दिन यूं ही बीतते गए और उन्होंने देखा कि कौवा एक बहुत अच्छा दोस्त है , और हमेशा उनकी मदद के लिए तैयार रहता है , कौवा सच्चा था , वह अपने दोस्तों को बेइंतहा प्यार करता था , तीनों दोस्त एक साथ मजे से रहते थे तथा सुख दुख में एक – दूसरे का साथ देते थे । कुछ समय पश्चात उस जगह पर भयानक अकाल पड़ा नदी – नाले सूखने लगे , पेड़-पौधे , घास सभी सूखने लगे ,और जंगल में खाने की बहुत किल्लत हो गई ।
                                                 कौवे ने कहा कि दोस्तों अब यहां पर रहना उचित नहीं है , यहां पर रहेंगे तो भूख से मर जाएंगे । यहां से बहुत दूर दूसरा जंगल है , जहां पर मेरा एक दोस्त है और वहां का जंगल हरा-भरा है , वहां पर खाने की खूब सारी चीजें हैं , हम लोगों को वहां पर जाना चाहिए । वहां पर हमारी मदद के लिए मेरा दोस्त हमेशा तैयार रहता है,  पहले तो कबूतर और चूहे को यह उपाय अच्छा नहीं लगा लेकिन बाद में सोच कर उन्होंने कौवे की बात मान ली और तीनों जंगल के लिए रवाना हो गए । कौवा चूहे को अपने चोंच में दबा कर उड़ने लगा और साथ में कबूतर भी उड़ने लगा । वे लोग बड़ी सावधानी से आगे बढ़ने लगे , दूसरे जंगल में पहुंचने के बाद उन्होंने देखा कि यह जंगल तो वाकई बहुत हरा-भरा है , और यहां खाने का भंडार है । कौवा एक तालाब के किनारे उतर गया और चूहे को भी नीचे उतार दिया । कबूतर भी कौवा के पास आकर उतर गया , फिर कौवे ने अपने दोस्त को जोर – जोर से आवाज लगाई ।
                                             तालाब से निकल कर उनके पास एक बड़ा सा कछुवा आया और उसने कौवे से कहा –  मेरे दोस्त तुम कितने दिन बाद आए हो , कहो तुम कैसे हो ? सब कुशल मंगल तो है ना ? तो कौवे ने सारी बात अपने दोस्त को बता दी । चारों दोस्त उस नदी के किनारे हंसी –  खुशी रहने लगे । कुछ दिन बाद जब यह चारों तालाब के किनारे बैठ कर बातें कर रहे थे , तभी एक हिरण भागते – भागते उनके पास आया , हिरण  हाँफ रहा था , उसकी साँसे फुली हुई  थी । कौंवे ने कहा ओ भाई हिरन कहां  चले जा रहे हो तुम इतना डर क्यों रहे हो ? तब हिरन ने कहा क्या तुम कुछ जानते हो बहुत बड़ी कठिनाई आने वाली है । यहां पर कुछ दूर नदी के किनारे एक राजा ने अपना डेरा लगाया है , इस राजा के सैनिक बहुत ही क्रूर और अत्याचारी है । कल वे इधर हि शिकार के लिए आयेंगे । उनके सामने जो भी आता है , उन्हें वो नष्ट कर देते हैं । अगर अपनी जान बचाना चाहते हो तो तुरंत यहां से भाग जाओ ! क्योंकि वे लोग कल सुबह ही शिकार के लिए निकल जायेंगे , हमारे पास समय बहुत कम है। यह बात सुनकर सभी परेशान हो गए और चारों  दोस्तों ने हिरण के साथ कही दूर चले जाने का निश्चय किया ।
                                            अब पांचों जानवर दौड़ते-दौड़ते दूसरी जगह पर जाने लगे चूंकि कछुवा बहुत बड़ा था और वह जमीन पर रेंगता है , इसलिए सभी धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे । कुछ दूर जाने के बाद एक शिकारी की नजर उस कछुवे पर पड़ गई , शिकारी दौड़ते हुए उसके पास आया । हिरन भाग गई कौवा और कबूतर पेड़ पर चढ़ गयें , चूहा बिल में घुस गया । लेकिन कछुवा कुछ ना कर पाया और उसे शिकारी ने पकड़ लिया और अपनी जाल में भरकर चलने लगा । यह देख कर सभी दोस्त बहुत परेशान हो गए और सोचने लगे कि कैसे इस संकट से छुटकारा पाया जाए और अपने दोस्त की जान बचा जाये ।उन्होंने एक तरकीब निकाली ।
                                          जैसे ही नदी के किनारे शिकारी ने जाल को नीचे रखा और खुद हाथ मुंह धोने के लिए नदी के नीचे उतरा वहीं पर कुछ दूर हिरन जमीन पर लेट गई और मरने का नाटक करने लगी । इतने में कौवा आया और हिरण पर चोंच मारने लगा । यह देख कर शिकारी ने सोचा कि यह हिरन अभी-अभी मरी होगी , उसका माँस अभी ताजा होगा । उसने उसे उठाने के नियत से उसके पास गया तभी बिल से चूहा बाहर आया और उसने कछुवे के जाल को काट दिया । कछुवा जल्दी से निकलकर तुरंत ही नदी में कूद गया और उसकी गहराइयों में गायब हो गया । चूहा बिल में घुस गया हिरन के नजदीक आते ही कौवा उड़ गया और हिरण भी तेज दौड़ लगाते हुए जंगलों में छिप गई । इस तरह सभी साथियों ने हिम्मत और बहादुरी के साथ काम करके , एकता से रहकर उन्होंने सबकी जान बचा ली। सभी साथी फिर से एक बार अपने गंतव्य के लिए निकल पड़े।
इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि , अगर एकता के साथ काम किया जाए तो बड़ी से बड़ी कठिनाई भी आसानी से हल हो जाती है ।
साथियों आपको यह पोस्ट कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बताये ।
धन्यवाद
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हिंदी कहानी सेठ जी की युक्ति

नमस्कार साथियों आज मैं आपको एक प्रेरणादायक प्रसंग के बारे में बता रहा हूँ कि कैसे एक सेठ ने एक अपराधी को सही रास्ते पर लाया । अपने बहुमूल्य विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताये ।
                                                           एक छोटे से कस्बे में एक सेठ रहता था । उसका एक बड़ा सा दुकान था , दिनभर दुकान के सामने सामान लेने वालों की कतार लगी रहती थी । इसलिए सेठ ने दो नौकर काम के लिए रख लिए । दोनों नौकर सुबह-सुबह ही दुकान आ जाते थे और देर रात तक दुकान में काम करते थे । सेठ दोनों नौकरों को बराबर मजदूरी देता था और सेठानी घर जाने के समय नौकरों को उनके बच्चों के लिए खाने – पीने का सामान दे देती थी । इस तरह कई दिन बीत गए सेठ को अपने दुकान की चीजें कम होती नजर आ रही थी , लेकिन दुकान के गल्ले में पैसा इतनी तेजी से नहीं बढ़ रहा था ।
                                                           
                                                             अब वे परेशान होने लगे उन्होंने यह बात अपनी पत्नी को बताई तो उसकी पत्नी ने भी कहा कि मुझे भी कुछ दिनों से यही महसूस हो रहा है , कि घर का सामान जल्दी-जल्दी खत्म हो रहा है । सेठ और सेठानी ने मामले की तहकीकात करने का निश्चय किया । सेठ और सेठानी एक-एक करके नौकरों के घर गए और उन्होंने उनके घरों की छानबीन की उन्हें एक नौकर के घर से दुकान के कुछ सामान दिखाई दिए । सेठानी ने सेठ को कहा कि उस नौकर को दुकान से निकाल दे , तो फिर सेठ सोचने लगे कि उस नौकर के छोटे-छोटे बच्चे हैं , उनका पालन पोषण कैसे होगा ? फिर अगर वह दूसरी जगह काम पर जाता है तो वह वहां भी चोरी करेगा ! उसको निकालने से काम नहीं बनेगा उसको कैसे सुधारा जाए और कैसे सच्चाई की राह पर लाया जाए इसके बारे में सोचना पड़ेगा ।
                                                                  सेठ ने दोनों नौकरों की मजदूरी बढ़ा दी , उनके बच्चों के लिए कपड़ा जूता और पढ़ाई लिखाई का खर्च भी दिया । तब सेठानी फिर से झगड़ा करने लगी कि , अपना सारा पैसा नौकर-चाकर पर लुटा दोगे तो , हमारे बच्चे क्या करेंगे , उनका भविष्य का क्या होगा , वह तो मर जाएंगे । तो उसने कहा कि नहीं सेठानी वह दोनों मेरे दुकान पर बड़ी मेहनत कर रहे हैं , उनके घर में अगर तंगी होगी तो उनका काम में मन नहीं लगेगा और भी गलत रास्ते पर चले जाएंगे उनको सुधारना मुझे बहुत जरूरी है , उनके सुधरने से हमें भी फायदा होगा । सेठ को अपने कार्य पर पूरा विश्वास था ।

 

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                                                                                    धीरे – धीरे दुकान में चोरी होना बंद हो गया और दोनों नौकर जी जान से , खुशी – खुशी काम करने लगे जिससे सेठ की आमदनी में भी बढ़ोत्तरी हुई । सेठ ने केवल अपने बारे में सोचा होता तो वह नौकर शायद कभी नहीं सुधरता , लेकिन सेठ जी की इस युक्ति से सभी का जीवन सुधर गया ।

Moral – हर अपराधी को दंड देकर ही नहीं सुधारा जाता बल्कि क्षमा और प्रेम से भी सुधारा जा सकता है ।

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सोने का फल

बहुत पहले की बात है ,एक छोटा सा गांव था, उस गांव के लोग खेती किसानी का काम करते थे । जिनके पास खेत नहीं होता था , वे भेड़ ,बकरी और गाय -भैंस चराने का काम करते थें ।  दूध ,दही , गोबर और कंडे बेचकर वे अपना गुजर बसर करते थे । उसी गांव में सुखराम नाम का आदमी रहता था , उसके पास खेत नहीं था । उसके पास बहुत सारी बकरियां थी , हरदिन वो उन्हें जंगलों में ले जाकर चराता था , और शाम होने पर अपने गांव लौट अाता था । बकरियां जंगल में जाकर , हरे-हरे पत्ते और घास को खाकर उछल-कूद करते हुए घर को लौट आती थी । 1 दिन की बात है , सुखराम अपनी बकरियों को लेकर जंगल में बहुत दूर निकल गया जेठ का महीना था । सूर्य की किरणें आग की तरह तप रही थी , गर्मी के कारण बहुत धुल उड़ रही थीं । जमीन भी कोयले की अंगारों जैसा प्रतीत हो रहा था । उसके आसपास पानी का कोई स्त्रोत नहीं था , सुखराम को बहुत प्यास लग रही थी । सुखराम प्यास के कारण  वही एक पेड़ के नीचे तड़पने लगा ।  बकरियां उसी के आसपास फैल कर चरने लगी , कुछ समय पश्चात भगवान श्री शंकर महादेव वहां पर आए और उन्होंने सुखराम को प्यार से तड़पते हुए देखा । भगवान श्री शंकर ने एक ऋषि का वेश धारण किया और अपने हाथ के कमंडल में पानी लेकर उसके पास पहुंच गए ।ऋषि ने पूछा क्यों सुखराम तुम क्यों तड़प रहे हो  ? सुखराम ने कहा – क्या बताऊं महाराज प्यास के मारे मेरे प्राण निकल रहे हैं । भगवान शंकर को उस पर दया आ गई , उन्होंने अपनी कमंडल का पानी सुखराम को पीने के लिए दिया और अपनी थैले से निकालकर कुछ फल सुखराम को खाने के लिए दे दिया । सुखराम ने कुछ फल खाया और पानी पिया । सुखराम का मन शांत हुआ और उसने बचा हुआ फल अपनी पोटली में रख दिया । दिन भर में थका हुआ सुखराम साँझ होने पर घर को लौटने लगा । घर लौटने पर उसने अपनी पत्नी सुखिया से बातचीत की और बचा हुआ फल रसोईघर के पाट के ऊपर रख दिया । रात में खाना खाने के बाद वह लोग सो गए , सुबह अगले दिन मुर्गे की बांग के साथ उसका नींद खुल गया । हाथ मुंह धो कर सुखराम रसोईघर में गया और पाट में रखे हुए फल को देखा । फल को देखकर वह सन्न रह गया साधु के दिए हुए फल सोने के बन गए थे , उसने उस फल को चुपचाप कपड़े में लपेट कर और बकरियों को लेकर जंगल की ओर चला गया । सुखराम मन ही मन बहुत बहुत गदगद हो रहा था , लेकिन कभी-कभी उसके चेहरे पर डर के भाव भी दिखाई दे रहे थे । दिनभर बीतने के बाद शाम को वह फिर घर आया । उसके बाद खाना खाकर सो गया , लेकिन रात भर उसे नींद नहीं आई । दूसरे दिन सुबह – सुबह ही वह उठ गया और अपनी पत्नी को कहा कि आज मुझे शहर में कुछ काम है ।  मैं आज जंगल में बकरी चराने नहीं जाऊंगा , आज तुम चली जाना । सुखिया ने जल्दी –  जल्दी घर का काम किया खाना खाया और बकरियों को लेकर जंगल की ओर निकल गई । सुखराम भी अपनी पोटली पकड़कर शहर की तरफ चला गया । शहर में पहुंचने के बाद सुखराम जल्दी-जल्दी एक सुनार के दुकान पर पहुंचा और उसने अपनी पोटली से सोने का फल निकालते हुए सुनार को दिया । सुनार चमचमाते सोने के फल को देखकर चकित रह गया । उसके मन में लालच आने लगा उसने पूछा इसे तौलना है क्या ? सुखराम ने झट से कहा – हां भैया इसे जल्दी से तौल दो और मुझे पैसा दे दो । सोनार ने सोने के फल को तराजू पर रखा और उसे रुपयों की गड्डी थमा दी । सुखराम ने कुछ भी सवाल जवाब नहीं किया और उल्टे पांव अपने घर वापस आ गया । इतने सोने की कम भाव देकर सुनार बहुत खुश हुआ और उसने सुखराम को कहा कि मेरे पास दोबारा जरूर आना , मैं पूरे शहर में तुमको सबसे अच्छा भाव दूंगा । सुखराम ने घर आकर सारी बात अपनी पत्नी सुखिया को बताई और रुपयों को गड्डी उसके हाथों पर रख दी । उसके बाद उन्होंने अपने घर के लिए नए-नए बर्तन खरीदें , नए कपड़े खरीदी , सुखिया ने अपने लिए बहुत से महंगे – महंगे जेवर  खरीदी । बहुत सारी बकरियां खरीदी और कुछ दिनों में उन्होंने अपने लिए एक बड़ा सा सुंदर घर बनवा लिया , उनकी इस अमीरी को देखकर गांव में चर्चा होने लगी कि यह लोग कुछ ही दिनों में इतने अमीर कैसे हो गए । दोनों बहुत बोले थे उन्होंने लोगों के बार बार पूछने पर बता दिया तथा अपनी सच्चाई को साबित करने के लिए वह सोने का फल भी लोगों को दिखा दिया । एक दिन उनके घर पर चार लोग आए और उन्होंने कहा हमने आपके बारे में बहुत कुछ सुना है ,क्या आप लोग सच बोल रहे हैं ? हम वो सोने का फल देखना चाहते हैं । क्या आप जो कह रहे हैं ,  वह वाकई सच है ? सीधे – साधे सुखराम ने उन चारों को सोने का फल दिखाकर पूरी कहानी बता दी । उसी रात  को उनके घर में चोर घुस आए , उन्होंने सुखराम के सोने के फल को चुरा लिया लेकिन खटपट की आवाज होने पर सुखराम की नींद खुल गई और उन्होंने उन चोरों को पहचान लिया , कि यह वही लोग है जो सुबह फल के बारे में पूछने के लिए आए थे । गांव में सुखराम के घर चोरी होने का हल्ला मच गया था । सुखराम सुबह-सुबह ही पंचायत में पहुंच गया और उसने सारी बात बता दी पंचायत ने उन चारों लोगों को बुलाया और पूछा कि क्या तुमने सुखराम के सोने का फल चुराया है  ? उन लोगों ने चोरी करने की बात स्वीकार नहीं की लेकिन पंचों के धमकाने के बाद वे डर गए और उन्होंने चोरी करने की सारी बात पंचायत के सामने कबूल कर ली । चोरों को चोरी किया हुआ फल लाने के लिए कहा गया उनमें से एक गया और छुपाया हुआ सोने का फल पोटली सहित लेकर आ गया । पंचों ने उस पोटली को खोल के देखा तो उसमें कच्चे फल थे । यह देखकर सभी आश्चर्यचकित हो गए । उन फलों को सुखराम को वापस कर दिया गया और चोरों को गांव से बाहर निकाल दिया गया । सुखराम वह फल देखकर निराश हुआ और अपनी पत्नी के साथ घर वापस आ गया , उसने वह फल वापस रसोईघर के पाट के ऊपर रख दिया । लेकिन यह क्या,  वह फल फिर से चमचमाते हुए सोने के फल में बदल गए यह देखकर सुखराम और सुखिया बहुत खुश हो गए और खुशी से नाचने लगे ।

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महापुरुषों का बचपन

                                                                                           महापुरुषों के प्रेरक प्रसंग

                                                                " शाहजी " अपने आश्रयदाता बीजापुर के सुल्तान के दरबार में जाने की तैयारी कर रहे थे , उनके मन में विचार आया क्यों ना शिवा को भी आज अपने साथ ले चलो | आखिर उसे भी तो एक ना एक दिन , इसी दरबार में नौकरी करनी है , दरबार के नियम कायदों का ज्ञान भी उसे होगा  |उन्हेंने आवाज लगाई शिवा तुझे भी आज मेरे साथ दरबार में चलना है | जल्दी तैयार हो जा पिता के आज्ञाकारी पुत्र ने आदेश सुना वह तुरंत तैयार हो गया , पिता पुत्र दोनों दरबार में पहुंचे | शाह जी ने सुल्तान के सामने झुक कर तीन बार कोर्निश किया , फिर वह अपने पुत्र की ओर मुड़ कर बोले बेटे यह सुल्तान है , हमारे अन्नदाता है , इन्हें प्रणाम करो |लेकिन निडर बालक ने कहा पिताजी मेरी पूजनीय तू मेरी मां भवानी है , मैं तो उन्हीं को प्रणाम करता हूं | पिता ने पुत्र की ओर आंखें तरेर कर देखा फिर सुल्तान को संबोधित करते हुए बहुत विनम्र स्वर में कहा - हुजूर यह अभी बच्चा है , दरबार के तौर-तरीके नहीं जानता , इसे माफ कर दीजिए | घर लौट कर जब पिता ने अपने पुत्र को उसके व्यवहार के लिए डांटा , तो उसने फिर कहा - पिताजी , माता ,पिता ,गुरु और मां भवानी के अलावा यह सिर और किसी के आगे नहीं झुक सकता |निडर बालक की बात सुनकर पिताजी सन्न रह गए | यही बालक आगे चलकर छत्रपति शिवाजी महाराज के रूप में प्रसिद्ध हुए ।

                                                                                                                                  प्रसंग दूसरा

                                                                  स्कूल में कक्षाएं लग रही थी , निरीक्षण के लिए शिक्षा विभाग के निरीक्षक आने वाले थे | नियत समय पर आए , एक कक्षा में विद्यार्थियों को उन्होंने 5 शब्द लिखने को दिए , उनमें से एक शब्द था कैटल , मोहन ने यह शब्द गलत लिखा | अध्यापक ने अपने बूट से ठोकर देकर इशारा किया कि , आगे बैठे लड़के की स्लेट देखकर शब्द ठीक कर ले | मोहन ने नकल नहीं किया , वह तो सोचता था की परीक्षा में अध्यापक इसलिए होते हैं कि , कोई लड़का नकल ना कर सके | मोहन को छोड़कर सब लड़कों के पांचों शब्द सही निकले , उस अध्यापक  भी नाराज हुए लेकिन उसने दूसरों की नकल करना कभी ना सीखा |यही बालक मोहन आगे चलकर मोहन दास करम चंद गाँधी अर्थात हमारे राष्ट्र पिता महात्मा गांधी के रुप में जाने गए।

                                                                                                                                   तीसरा प्रसंग

विद्यालय लगा था , लेकिन एक कक्षा में कोई शिक्षक नहीं थे , उस कक्षा के कुछ विद्यार्थी बाहर टहल रहे थे , कुछ कक्षा में बैठे मूंगफली खा रहे थे | वह मूंगफली के छिलके वही कक्षा में फेंक रहे थे ; शिक्षक कक्षा में आए और कक्षा में मूंगफली के छिलके बिखरे देखकर बहुत क्रोधित हुए  |उन्होंने पूछा कक्षा में मूंगफली के छिलके किसने फैलाए हैं किसी विद्यार्थी ने कोई जवाब नहीं दिया शिक्षक ने दोबारा वही प्रश्न कठोरता से किया किंतु फिर भी किसी छात्र ने कोई उत्तर नहीं दिया अब की बार शिक्षक ने हाथ में बैग लेकर कहा अगर सच सच नहीं बताया तो सबको मार पड़ेगी एक छात्र के पास पहुंचे और उससे बोले मूंगफली के छिलके किसने ठेके है जी मुझे नहीं मालूम छात्र ने उत्तर दिया सटक सटक दो भेद उसके हाथ में पड़े छात्र तिलमिलाकर रह गया शिक्षक दूसरे तीसरे चौथे छात्र के पास पहुंचे सभी से वही प्रश्न किया सभी का उत्तर था मुझे नहीं मालूम सबके हाथों पर सटक सटक की आवाज हुई अब शिक्षक पांचवें छात्र के पास पहुंचे उससे भी वही प्रश्न किया छात्र ने उत्तर दिया श्रीमान जी ना मैंने मूंगफली खाई ना छिलके फेंके मैं दूसरों की चुगली नहीं करता इसलिए नाम भी नहीं बताऊंगा मैंने कोई अपराध नहीं किया इसलिए मैं मार भी नहीं खाऊंगा शिक्षक छात्र को लेकर प्रधानाध्यापक के पास पहुंचे प्रधानाध्यापक ने सारी बात सुनकर बालक को विद्यालय से निकाल दिया बालक ने घर जाकर पूरी घटना अपने पिताजी को सुनाई दूसरे दिन पिताजी वाला को लेकर विद्यालय में पहुंचे तेजस्वी पिता ने प्रधानाध्यापक से कहा मेरा पुत्र सत्य नहीं बोलता वह घर के अतिरिक्त बाजार की कोई चीज भी नहीं खाता उसका आचरण बहुत संयमित है मैं अपने पुत्र को आपके विद्यालय से निकाल सकता हूं किंतु निरपराध होने पर उसे दंडित होते नहीं देख सकता प्रधानाध्यापक शांत हो गए यही बालक आगे चलकर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के नाम से प्रसिद्ध हुआ उन्होंने नारा दिया था स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूंगा

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