छत्तीसगढ़ी कहानी “आरो”chhattisgarhi story

## आरो ##

नान्हे-नान्हे लइका लोग बर अड़बड़ मया । पारा गली म सबके सुख-दुख म आघु ले आघु खड़े हो जाय । सब झन बर मयारू रहिन, फेर अपने बर बिरान होगे रहिस ढेला ह।भला बनी-भूति करके पेट पालय । फेर सबो के सुख-दुख के आरो ले । हटरी के दिन खाई खजानी बर लइका मन कलर कलर करे। सबो बर अतीक मया फेर अभागिन ह बेटा-बहु के सुख ल नई पाइस। नान्हें पन म बपुरी के बिहाव बर होगे रहिस । काल के मालिक कोन होथे । एकेच झन बाबू भर निभे रहिस, उँकर जोड़ी ह उँकर संग ल छोड़ सरग सिधारगे। नान्हे लइका के मुहू म पेरा झन गोंजाय कहिके बपुरी ह अपन जिनगी अपन बाबू सुखीराम ल देख के बिता दिन। दिन भर बनी-भूति, गौटिया घर गोबर-कचरा, त ककरो कुटिया-पसिया। जेकर जइसन दया उले दु चार पईसा दे दे।अपन मुंह ल बांध जांगर तोड़ पसीना गारके अपन बाबू बर कोनो कमी नई होवन दिस।बाबू बड़े होइस त उँकर पढ़े-लिखे के घला बेवस्था करिन।

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दिन बीते लगिस बाबू सुखीराम जवान होगे रहिस ।महतारी बेटा दुनो के मेहनत के परसादे अब घर म कोनो किसम के कमी नई रहिस।
अपन जिनगी ल बाबू बर निछावर करके आज के सुघ्घर दिन के सपना मन म सिरजाये रहिस।बाबू के पसन्द ले नोनी देख के उँकर हाथ पिवरा दिन।ढेला ह बाबू के बिहाव म कोनो किसम के कमी नई करिन । गांव वाले मन त देखते रहिगे। का बेंड बाजा, मोतीचूर के लाडू,नचनिया,अउ सगा सोदर। जात बिरादरी के मान गउन म कोनो किसम ले कमी नई आवन दे रहिस।जइसे ढेला ह इही दिन के सपना ल सिरजा के राखे रहिस।”सिरतोन म जेन अभागिन के सरी जिनगी ह हिरदे ल कठवा-पथरा करके अपन जिनगी के एकेच ठिन सपना देखय वहु पूरा हो जाय त मन अघा जाथे।”


उछाह मंगल ले बाबू के बिहा निपटगे अब जइसे ढेला के जिनगी म बड़ जन काम पूरा होगे।नाती -नतरा के सपना सिरजाये लगिस ।फेर कभू-कभू मनखे के खुशी म नजर लग जाथे ।बेटा बहु म खिटीर-पिटिर चालू होगे।बात बढ़े लगिस।उँकर खिट-पिट म रतिहा घर म ढेला सँसो के बादर म बूड़गे।
सियान ह घर म कोनो ऊंच-नीच देख के सीखाए बर दु टपपा कहि परथे तेहा नवा बहु बेटी मन बर भारी हो जाथे।”सियान मन अपन जमाना के रीत ले सकेले अपन ढंग ले साव चेत होवतआगू डहर बढ़ना चाहथे त जवान मन अपन ढंग ले नवा जमाना के सङ्गे संग आगू बढेबर देखथे कभू-कभू पीढ़ी के इही भेद म सुनता-सुमत के बिना डाँड़ खींचा जाथे जेन आज के ऊपर बर भारी परथे।

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इही समय के डाँड़ ह आज ढेला के दुवारी म परगे बहु नवा जमाना के नोनी आय उँकर गांव समाज के लोक लिहाज,अउ कोनो अउ काम ल अपन ढंग ले करेबर ढेला के दु चार बात बहुरिया ल पुचर्री लागे अउ इही बात ल लेके सुखी राम संग खिट-पिट हो जाये।सुखीराम बहुत समझाय के कोशिस करिन फेर ढेला नई मानय ।कोन बइरी कोन हित।पारा परोस के एक दु झन चुगलहिं मन घला अब बहुरिया के कान ल भर दे रहिस।अब बात मुड़ के आगू बड़ गए रहिस दु चार झन हितु -पिरोतु मन के समझाय ले घला बात नई बनिस।बहु ह हांडी सथरा, पोरसे बांटे ल बंद कर दिन। बिहनिया सूत उठ के ढेला ह सुखी राम ल अपन तीर बलइस अउ कहिस:-बेटा तोर गोसईन सन तै बने खा कमा मोर दु चार दिन के जिनगी मैं तुंहर खुसी म आड़ नई बनव। बात आगू बढ़गे रहिस बेटा बर दाई अउ बाई म कोनो ल चुनना बड़का बात रहिस।जेन दाई जिनगी ल उँकर बढवारी म खपा दिस तिरिया के हठ म इही ल छोड़े ल परही विधाता एसनहा दिन कोनो ल झन दिखाये।


बेटा वो तोर बरे बिहई ये,तोर छोड़ वोकर कोन हवय ।अभी मोर जांगर चलत हवय जेन दिन थक जाहु त विहिच तो मोर सरी ल करही अभी मन ल मढावन दे बइही ल ढेला ह सुखीराम ल समझावत कहिस।दु चार सियान मन बेटा बहु ल समझाइस फेर बात नईच बनिस त उँकर बंटवारा होगे सियान मन ढेला ल कहिस तोर जियत ले दु हरिया के खेती त अपन तीर राख विही म तोर जिनगी चलहि।इकर हाथ गोड़ मजबूत है खाय कमाय।फेर ढेला नई मानिस कहिस अब ये उमर म खेती खार म दवा दारू मोर ले नई होवय अउ इंकर ले जोन बोरा खंड मिल जाहि विही म जिनगी चला लेहु।
जेन लइका मन सियान बर थोरको मया नई करिस ओकरो बर कतका मया।सिरतो दाई दाई होथे जिनगी भर देथे अपन हिस्सा के सुख ,मया,पिरित अउ आशीष के छइहाँ देके हमर जिनगी ल भागमनी बना देथे।बदला म वो हमर हिस्सा के दुख ल हाँसत ले लेथे।

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ढेला बनी भूति करके अपन दिन बिताये।बहु ह सुखीराम ल अपन आघु म सियानहीन ले गोठियाय ल घला नई दे।सुखी अउ ढेला के बीच परछी म कोठ खड़े होगे रहिस ।दिनभर के खेती-मजूरी म बेटा बहु ह नवा जमाना के खर्चा ल नई पुर सकय।वोतकी म ढेला ह दू पइसा बचा डरे। बेटा बहु के ऊपर जब कोनो बिपत आतिस के कोठ तीर कान देके आरो लेवत कोनो किसम ले मदद करतिस।हाट बाजार म नाती -नतनीन बर चना फूतेना,लाई-मुर्रा,कांदा-कुसा,लेतिस लइका मन दाई तीर जुरियाबे रहे।झिम झाम देख के सुखी राम दाई तीर आये त उँकर हाथ कभू कोनो जिनिस ल घला ढेला ह भितराउंधि दे दय।


ढेला लोग लइका मन के अतकी च मया दुलार म खुश रहिस।रात दिन के हकर-हकर बूता काम म तन थक गे रहिस अउ संसो के घुना ह मन त खात रहिस एक दिन ढेला बीमार परगे डोकरी खेर-खेर खाँसे अब तो बीमार डोकरी तीर लोग लइका के अवई -जवई घला बंद होगे।बेटा जरूर डॉक्टर के बुला के सूजी-पानी करिन फेर जतन-रतन
खान -पान ढंग ले नई हो पाइस ।

अउ एक दिन रतिहा कोठ के तीर म जठे खटिया म करलई बमलई करत सियानहीँ ह पराण ल तियाग दिन।जइसे वोहर कोठ म बेटा बहु के आरो लेवत समागे।फेर सियानहीँ के आरो कोई नई लीन।बिहाने सबो बिरादरी के म न सकलाइन बहु ह पढ़-पढ़ के रोवत रहय फेर अब ढेला माटी के काया होगे रहिस कहा ल आरो पाहि?

छत्तीसगढ़ के परब सवनाही

           //  सवनाही //

रिमझिम पानी के बून्द परे ले धरती नवा रूप के सिरजन होथे। तरिया, डबरी नदिया नरवा के कलकलात रूप,मेचका झिंगरा के रतिहा संगीत के सङ्गे संग घुरूर घरर बादर ,चम चम बिजरी घुमड़त बरखा म सिरतोन धरती के नवा रूप मन ल भाथे ।ये रूप ह रूख राई ,परानी सबो के मन म उछाह भरथे।सावन महीना ले इही उछाह ह मनखे के आने आने भाव संग रीत अउ परब बन जाथे।किसान धरती के सेवा बजात अपन जिनगी बर इही तीज तिहार म कामना करथे अउ मेहनत के बीच जांगर ल अराम देथे।

   छत्तीसगढ़ के माटी परब तिहार अउ मनौती के माटी आय।इहा सब के सुनता सुमत अउ खुशाली बर कतकोन उदिम ले सिरजन होथय।गांव के भुइया म शक्तिपीठ के रूप म शीतला, भूमियरिंन,भईसासुर ,सतबहिनी, राउतराय,लिंगो, संहड़ा गउरागुड़ी असन कतको ठउर रथे जिकर पूजापाठ अउ मनोउती ले मनखे के मन म धीरज आथे।गांव के पूजारी जेल बईगा कथे हुम् धूप अउ पूजा- पाठ ले गांव म कोनो बिपदा झन होव एकर कामना करथय।

*कब मनाथे*

रथदुज के बाद आषाढ़ के आखिरी नही त सावन के पहिली इतवार के दिन सवनाही मनाये के चलन हावय।सवनाही म गांव के काम काज बन्द रहिथे अउ  बईगा ह पूजा- पाठ करके सब देवी देवता के सुमिरन कर के गांव के धन -जन बर  मनउती मांगत गांव के खल्हउस (उतार) म सवनाही  रेगांथे। नान्हे नांगर गड़िया के निम्बू, बन्दन,नरियर,हुम् धूप,धजा, फीता, कारी कूकरी ,मरकी ,मन्द, पूजा समान के रूप म रथे।

पूजा म फोड़े नरियर ल पूजा म शामिल मनखे मन परसादी पाथे।गांव के सिमा ले बाहिर कूकरी ल छोड़थे।अउ एला पाछु लहुट के नई देखय।गांव ल भूत, प्रेत जादू टोना ले बचाय के उदिम करें जाथे।

*तिहार के पाछु कारण*

मनखे मन मानथय सावन महीना के सिमसीमात दिन बादर म जादू- टोना के प्रकोप बढ़ जाथे।जिकर ले गांव के सुरक्षा, रोग राई ले बचाव, मनखे के संग-संग गरु गाय, खेती- बारी के सुरक्षा के भाव एमा रहिथे। गांव- गांव म घर के मोहाटी कोठ म जादू टोना ले बचें बर गोबर के पुतरी (सवनाही)बनाथय। कहे जाय त धरती म आए बदलाव बर मनखे ल मानसिक रूप ले तैयार करे के भाव ए तिहार म होथे।नवा जग म कतकोन परिवर्तन होवत है ,फेर गांव के गुड़ी  चउपाल ह हमर परब ल सिरजा के रखे हे।

*सवनाही अउ इतवारी तिहार*

खेती किसानी म भुलाये मनखे ल आराम कहाँ…!इही सवनाही तिहार के दिन ले किसानी के काम म भुलाये जांगर तोड़ कमईया किसान बर हफ्ता म एक दिन इतवार के छूट्टी रखे जाथे। जेहा दशेरा के आवत के चलथे।ये दिन म माईमन घर अंगना के जतन ,कपड़ा लत्ता के सफाई,चाउर दार के बूता ल करथे त बाबू मन गांव के गुड़ी म सकलाक़े सियानी गंवारी के गोठ करत समस्या निपटाय के उदिम करथे। गांव के रामधुनी,रमायन के कार्यक्रम घला मनोरंजन करथे।

हमर ये परब ल भला हमन कुरुति मानथन फेर हमर पुरखा मन ह बिग्यान के जानकार रहिस।अउ उकर उही ज्ञान के दरसन ह हमर रीत परब म होथे।

धरती म आय बदलाव ले ए मौसम म रोग राई, जर जुड़ बढ़ जाथे ।

 गुंगुर धूप ल घर म गुंगवाथे हमन भला जादु टोना के रुप म मानथन फेर जीवाणुनाशी के रूप म एला बउरथे । तीज तिहार म रोटी पीठा मेहनत कस जिनगी म पोषण के पुरती करथे।

हमर ये रीत परब मन हमर चिन्हारी आय जे हर माटी अउ धरती के रूप ले जुड़े हावय।

महापुरुषों के अनमोल वचन