छत्तीसगढ़ी कहानी “आरो”chhattisgarhi story

## आरो ##

नान्हे-नान्हे लइका लोग बर अड़बड़ मया । पारा गली म सबके सुख-दुख म आघु ले आघु खड़े हो जाय । सब झन बर मयारू रहिन, फेर अपने बर बिरान होगे रहिस ढेला ह।भला बनी-भूति करके पेट पालय । फेर सबो के सुख-दुख के आरो ले । हटरी के दिन खाई खजानी बर लइका मन कलर कलर करे। सबो बर अतीक मया फेर अभागिन ह बेटा-बहु के सुख ल नई पाइस। नान्हें पन म बपुरी के बिहाव बर होगे रहिस । काल के मालिक कोन होथे । एकेच झन बाबू भर निभे रहिस, उँकर जोड़ी ह उँकर संग ल छोड़ सरग सिधारगे। नान्हे लइका के मुहू म पेरा झन गोंजाय कहिके बपुरी ह अपन जिनगी अपन बाबू सुखीराम ल देख के बिता दिन। दिन भर बनी-भूति, गौटिया घर गोबर-कचरा, त ककरो कुटिया-पसिया। जेकर जइसन दया उले दु चार पईसा दे दे।अपन मुंह ल बांध जांगर तोड़ पसीना गारके अपन बाबू बर कोनो कमी नई होवन दिस।बाबू बड़े होइस त उँकर पढ़े-लिखे के घला बेवस्था करिन।

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दिन बीते लगिस बाबू सुखीराम जवान होगे रहिस ।महतारी बेटा दुनो के मेहनत के परसादे अब घर म कोनो किसम के कमी नई रहिस।
अपन जिनगी ल बाबू बर निछावर करके आज के सुघ्घर दिन के सपना मन म सिरजाये रहिस।बाबू के पसन्द ले नोनी देख के उँकर हाथ पिवरा दिन।ढेला ह बाबू के बिहाव म कोनो किसम के कमी नई करिन । गांव वाले मन त देखते रहिगे। का बेंड बाजा, मोतीचूर के लाडू,नचनिया,अउ सगा सोदर। जात बिरादरी के मान गउन म कोनो किसम ले कमी नई आवन दे रहिस।जइसे ढेला ह इही दिन के सपना ल सिरजा के राखे रहिस।”सिरतोन म जेन अभागिन के सरी जिनगी ह हिरदे ल कठवा-पथरा करके अपन जिनगी के एकेच ठिन सपना देखय वहु पूरा हो जाय त मन अघा जाथे।”


उछाह मंगल ले बाबू के बिहा निपटगे अब जइसे ढेला के जिनगी म बड़ जन काम पूरा होगे।नाती -नतरा के सपना सिरजाये लगिस ।फेर कभू-कभू मनखे के खुशी म नजर लग जाथे ।बेटा बहु म खिटीर-पिटिर चालू होगे।बात बढ़े लगिस।उँकर खिट-पिट म रतिहा घर म ढेला सँसो के बादर म बूड़गे।
सियान ह घर म कोनो ऊंच-नीच देख के सीखाए बर दु टपपा कहि परथे तेहा नवा बहु बेटी मन बर भारी हो जाथे।”सियान मन अपन जमाना के रीत ले सकेले अपन ढंग ले साव चेत होवतआगू डहर बढ़ना चाहथे त जवान मन अपन ढंग ले नवा जमाना के सङ्गे संग आगू बढेबर देखथे कभू-कभू पीढ़ी के इही भेद म सुनता-सुमत के बिना डाँड़ खींचा जाथे जेन आज के ऊपर बर भारी परथे।

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इही समय के डाँड़ ह आज ढेला के दुवारी म परगे बहु नवा जमाना के नोनी आय उँकर गांव समाज के लोक लिहाज,अउ कोनो अउ काम ल अपन ढंग ले करेबर ढेला के दु चार बात बहुरिया ल पुचर्री लागे अउ इही बात ल लेके सुखी राम संग खिट-पिट हो जाये।सुखीराम बहुत समझाय के कोशिस करिन फेर ढेला नई मानय ।कोन बइरी कोन हित।पारा परोस के एक दु झन चुगलहिं मन घला अब बहुरिया के कान ल भर दे रहिस।अब बात मुड़ के आगू बड़ गए रहिस दु चार झन हितु -पिरोतु मन के समझाय ले घला बात नई बनिस।बहु ह हांडी सथरा, पोरसे बांटे ल बंद कर दिन। बिहनिया सूत उठ के ढेला ह सुखी राम ल अपन तीर बलइस अउ कहिस:-बेटा तोर गोसईन सन तै बने खा कमा मोर दु चार दिन के जिनगी मैं तुंहर खुसी म आड़ नई बनव। बात आगू बढ़गे रहिस बेटा बर दाई अउ बाई म कोनो ल चुनना बड़का बात रहिस।जेन दाई जिनगी ल उँकर बढवारी म खपा दिस तिरिया के हठ म इही ल छोड़े ल परही विधाता एसनहा दिन कोनो ल झन दिखाये।


बेटा वो तोर बरे बिहई ये,तोर छोड़ वोकर कोन हवय ।अभी मोर जांगर चलत हवय जेन दिन थक जाहु त विहिच तो मोर सरी ल करही अभी मन ल मढावन दे बइही ल ढेला ह सुखीराम ल समझावत कहिस।दु चार सियान मन बेटा बहु ल समझाइस फेर बात नईच बनिस त उँकर बंटवारा होगे सियान मन ढेला ल कहिस तोर जियत ले दु हरिया के खेती त अपन तीर राख विही म तोर जिनगी चलहि।इकर हाथ गोड़ मजबूत है खाय कमाय।फेर ढेला नई मानिस कहिस अब ये उमर म खेती खार म दवा दारू मोर ले नई होवय अउ इंकर ले जोन बोरा खंड मिल जाहि विही म जिनगी चला लेहु।
जेन लइका मन सियान बर थोरको मया नई करिस ओकरो बर कतका मया।सिरतो दाई दाई होथे जिनगी भर देथे अपन हिस्सा के सुख ,मया,पिरित अउ आशीष के छइहाँ देके हमर जिनगी ल भागमनी बना देथे।बदला म वो हमर हिस्सा के दुख ल हाँसत ले लेथे।

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ढेला बनी भूति करके अपन दिन बिताये।बहु ह सुखीराम ल अपन आघु म सियानहीन ले गोठियाय ल घला नई दे।सुखी अउ ढेला के बीच परछी म कोठ खड़े होगे रहिस ।दिनभर के खेती-मजूरी म बेटा बहु ह नवा जमाना के खर्चा ल नई पुर सकय।वोतकी म ढेला ह दू पइसा बचा डरे। बेटा बहु के ऊपर जब कोनो बिपत आतिस के कोठ तीर कान देके आरो लेवत कोनो किसम ले मदद करतिस।हाट बाजार म नाती -नतनीन बर चना फूतेना,लाई-मुर्रा,कांदा-कुसा,लेतिस लइका मन दाई तीर जुरियाबे रहे।झिम झाम देख के सुखी राम दाई तीर आये त उँकर हाथ कभू कोनो जिनिस ल घला ढेला ह भितराउंधि दे दय।


ढेला लोग लइका मन के अतकी च मया दुलार म खुश रहिस।रात दिन के हकर-हकर बूता काम म तन थक गे रहिस अउ संसो के घुना ह मन त खात रहिस एक दिन ढेला बीमार परगे डोकरी खेर-खेर खाँसे अब तो बीमार डोकरी तीर लोग लइका के अवई -जवई घला बंद होगे।बेटा जरूर डॉक्टर के बुला के सूजी-पानी करिन फेर जतन-रतन
खान -पान ढंग ले नई हो पाइस ।

अउ एक दिन रतिहा कोठ के तीर म जठे खटिया म करलई बमलई करत सियानहीँ ह पराण ल तियाग दिन।जइसे वोहर कोठ म बेटा बहु के आरो लेवत समागे।फेर सियानहीँ के आरो कोई नई लीन।बिहाने सबो बिरादरी के म न सकलाइन बहु ह पढ़-पढ़ के रोवत रहय फेर अब ढेला माटी के काया होगे रहिस कहा ल आरो पाहि?

मानसून एक दिन पहले आ गया ।new hindi story 2020

क्या कहा ? मैं एक दिन पहले आ गया । अरे हां भई तो इसमें कौन सा पहाड़ टूट पड़ा । मेरे साथ तो बादलों के , हवाओं के , लंगर - लश्कर साथ में होते हैं ना । क्या कहा मेरी रंगत बदल गई है । बिल्कुल ठीक कहा तुमने , सब कुछ तो बदल गया ।

सैकड़ों वर्षो पहले मेरी मनुहार की जाती थी ।मल्हार राग की रचना करने वाले तानसेन से ही पूछ लो ।कितने प्यार से , लाड़ -दुलार से , मुझे न्यौता दिया जाता था ।

कभी हवन के सुगंधित सामग्रियों की सुगंध द्वारा मुझे रिझाया जाता तो कभी मंत्रोच्चार द्वारा मुझे संदेश भेजा जाता । और मैं भी झूम - झूम कर बरसता था । और कालिदास की " मेघदूत " कृति से मैं संदेशवाहक की भूमिका भी निभाता था।

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देश - काल , समय के अनुसार मुझे भी बदलना पड़ा । मुझे तो बादलों के ढोल - नगाड़ों की थाप पर , पानी की बूंदों का सेहरा बांध वसुधा की पत्तियों पर , शाखों पर , पर्वत - पहाड़ों पर , थिरकना भाता है ।

जब मैं बरसता हूं तो पानी की बूंदों के साथ ताल , तालाब , नदियां , समंदर सभी खुश रहते हैं । अरे मानुष की बात तो छोड़िए , पशु - पक्षी सब प्रसन्न होते हैं । पशुओं की खाल पर से मैं गुदगुदी करते फिसलता हूं तो ऊंचे परवाज वाले पक्षियों के पंखों पर पूरे आकाश भी घूम आता हूं ।

बदलते वक्त के साथ इतना कुछ बदल गया । मेरे राह के साथी घने जंगलों , निरीह वृक्षों को जब काटा गया तो भला मेरा सृजन कैसे होगा ? दुष्परिणाम मेरा उत्पादन कम होता गया ।

पहले तो पग- पग में छोटे- बड़े कानन ,जंगल वृक्ष मेरी अगवानी में खड़े मिलते थे । पहाड़ों के घर मेरा ठौर हुआ करता था । वसुधा के जलवाष्प पहले मेरे घर गर्मियों में छुट्टी मनाने आते हैं , फिर उन्हीं की ठंडक से बादलों की तश्तरी में सजा कर फिर धरती की ओर बारिश के रूप में मुझे परोसा जाता था ।

अहा जब मैं गांव , शहर , खेत - खलिहानों में बरसता हूं तो पूरी धरती धानी चुनर ओढ़ कर शर्माती फिरती है । किसानों के , बैलों के चेहरों की रंगत देखते ही बनती है । मेरी आगवानी में बागों में झूले भी बांधे जाते हैं , और कितनी कागज की कश्तियों को मेरा इंतजार रहता है , यह बच्चों से पूछ लो ।

कितनी नवविवाहिताएं पीहर से संदेश भेजती है । यह उनकी कलाइयों की चूड़ियों से पूछ लो ..... । अरे भई मैं तो सदियों से समय का पाबंद रहा हूं । पर आज मेरी रफ्तार जरा सी तेज करनी होगी ना ।रास्ते में व्यवधान कितने हैं ? अम्लीय वायु मेरे भीतर बिना मेरी इजाजत के आ जाता है और अम्लीय वर्षा के रूप में मैं बदनाम होता हूं ।

हजारों कारखाने से उठते प्रदूषित वायु से मैं खाँस - खाँस कर बेहाल हो जाता हूं । ऊपर से भयानक प्रदूषण जगह-जगह मेरा रास्ता रोके खड़े रहते हैं । बताओ इतनी बाधाओं से भला एक अकेली जान कैसे निपटें ?

गगनचुंबी इमारतें , कटते वन ,कारखानों से निकले धुँए से मेरा जीना दूभर हो गया है । पर मैं अपने कर्तव्य से कैसे मुंह मोड़ मलूँ । मुझे जिस कार्य के लिए सृष्टि ने रचा है उस कार्य को तो मुझे हर हाल में करना ही है ।

मानव जाति गलतियों पर गलतियां किए जा रही है मैं बस खामोशी से सह रहा हूं । और ऊपर से दुनिया जहान के ताने कि मैं बदल गया हूं । खंड वर्षा करता हूं । कहीं अकाल तो कहीं भुखमरी ला रहा हूं । यह सुन - सुन कर मेरी आत्मा छलनी हो जाती है ।

भला मानव जाति जिनका अस्तित्व मेरे से ही है तमाम इतिहास , संस्कृतियों का गवाह और उद्गम स्रोत मैं हूं यह जान कर भी क्या मैं वादा खिलाफी कर सकता हूं ? मेरा पोर - पोर अब दुखने लगा है । मैं तो सृष्टि के प्रारंभ से ही अपना कार्य करता आया हूं पर अब इतनी थकान , अरुचि जो अभी हो रही है वैसी पहले कभी नहीं हुई थी ।

जहरीले हवा वातावरण में घुली हो ऐसा ही नहीं है अब तो मेरे ही बच्चों की शहादत वाले बारूद की गंध मेरी शरीर में नासूर की तरह चुभ रहे हैं । कहीं आतंकवाद तो कहीं नक्सली बारूदों का प्रयोग कर रहे हैं ।

मानुष गंध , चीथड़ों के कण , हजारों यतीम बच्चों के उदास आंखें , शहीदों के मांओ के " आंसू से रिक्त आँखे " उन सबके चुभते प्रश्नों का सामना करते - करते मैं थक चुका हूं । सिर पकड़ कर बैठे किसानों के कुम्हलाये चेहरे मुझे रुला देते हैं । पर मेरे आंसू कहां सबको दिखते हैं ? वो तो बारिश में भूल जाते हैं ।

अब तो मेरी तासीर नाली में बहते पानी जैसे हो गई । पर मैं तुरंत उठता हूं पूरे जोश के साथ , बादलों के लंगर लश्करों के साथ , तमाम शहीदों के खून से रंगी वादियों , किसानों की उदासी , तालाबों की मायूसी , पशुओं की पीड़ा , पेड़ों के अंतरनाद , मानव जाति के चित्कार , इन सब को धोने की उनके चेहरों पर फिर से खुशहाली दिख जाए इसी आशा के साथ मैंने अपनी रफ्तार बढ़ा दी है । तभी तो एक दिन पहले आ पहुंचा हूं । और लोग कहते हैं कि मानसून एक दिन पहले आ गया ।

चतुर बेटी। Intresting story for kids 2020।

बहुत समय पहले की बात है ,एक गांव में एक बुढ़िया रहती थी, वह बहुत उदास रहती थी । वह हर समय अपनी बेटी की यादों में खोए हुए रहती थी । उसकी इकलौती बेटी का विवाह पिछले वर्ष ही पास के ही एक गांव में हो गया था । वह अपने बिटिया के घर जाना चाहती थी , किंतु उसके गांव के रास्ते में एक घनघोर जंगल पड़ता था । उस जंगल को पार करने के लिए लोग डरते थे, वहां खूंखार जंगली जानवर भटकते रहते थे । इस तरह बुढ़िया कई दिनों तक सोचती रही । एक दिन उसने निश्चय कर लिया कि अब कुछ भी हो जाए मैं अपनी बेटी के घर जरूर जाऊंगी और ऐसा सोचकर अगले ही दिन सुबह वह एक पोटली में कुछ खाना और कपड़े लिए हाथ में डंडा पकड़े घर से निकल गई ।

कुछ दूर चलने के बाद जंगल शुरू हुआ जंगल में घुसते ही उसका कलेजा कांपने लगा ।फिर भी बेटी के याद में उसने अपनी हिम्मत बढ़ाई और धीरे-धीरे जंगल में सावधानी से आगे बढ़ने लगी । कुछ ही देर बाद उसके सामने गुर्राता हुआ एक चीता आया । उस चीते ने कहा – ऐ बुढ़िया तुम कहां जा रही हो ?? मैं बहुत भूखा हूं । मैं तुम्हें खा जाऊंगा । बुढ़िया को तो जैसे काटो तो खून नहीं ! उसके मुंह से आवाज नहीं निकल पा रही थी ,उसके हाथ पैर कांपने लगे । लेकिन तभी बुढ़िया ने अचानक कहा कि – बेटा मुझे खाने से तुम्हें क्या मिलेगा ? मेरे शरीर में तो माँस ही नहीं है , सिर्फ हड्डियां ही हड्डियां है । तुम मुझे बाद में खा लेना , मैं अपनी बेटी के घर जा रही हूं । मैं वहां से बढ़िया खा – पीकर मोटी – तगड़ी होकर जब वापस आऊंगी, तब तुम मुझे खा लेना । चीता ने कहा – तुम मुझे बेवकूफ तो नहीं बना रही हो ? बुढ़िया ने कहा – नहीं – नहीं बेटा , मैं तुम्हें बेवकूफ कैसे बना सकती हूं ! तुम चाहो तो अभी मुझे खा सकते हो , लेकिन तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा । यही अच्छा होगा कि तुम मुझे बेटी के घर से आने के बाद खा लो । मैं एक नजर अपनी बेटी को देखना चाहती हूं । चीता ने कहा – ठीक है बुढ़िया , मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा , अब जाओ और जल्दी आना ।

बुढ़िया डरते हुए आगे बढ़ी , थोड़े ही दूर जाने के बाद बड़े-बड़े बालों वाला एक काला भालू उसके पास आया और जोर से गुर्राया । भालू ने कहा – ऐ बुढ़िया! मैं तुम्हें मार कर खा जाऊंगा , मुझे बहुत भूख लगी है । बुढ़िया ने फिर भालू से कहा कि – बेटा मेरा शरीर तो एकदम सूखा हुआ है , मांस इसमें है ही नहीं । तुम्हें मुझे खा कर क्या मिलेगा ? मैं अपनी बेटी के घर जा रही हूं , वहां से खा -पीकर मोटी – तगड़ी होकर जब वापस आऊंगी, तब मुझे तुम खा लेना । भालू ने कहा – तुम ये क्या कह रही हो ! तुम बचकर जाना चाहती हो ? मैं तुम्हारे बहकावे में नहीं आऊंगा । मैं तुम्हें अभी मार कर खा जाऊंगा । बुढ़िया ने कहा नहीं – नहीं बेटा , मैं भला तुमसे क्यों झूठ बोलूंगी , तुम मेरा विश्वास करो , मैं वापस जरूर आऊंगी और तुम्हें खाने में भी मजा आएगा , मैं तुम्हें विश्वास दिलाती हूं कि मैं तुम्हारे पास वापस जरूर आऊंगी । भालू ने कुछ सोचते हुए कहा – ठीक है बुढ़िया तुम वापस जरूर आना , मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा , जाओ अब तुम जल्दी जाओ । बुढ़िया मन ही मन सोच रही थी कि मैंने कैसे इन लोगों से छुटकारा पा लिया है ।

कुछ दूर आगे चलने पर बुढ़िया को एक खूंखार बाघ दिखाई दिया । बाघ ने दहाड़ते हुए कहा – ऐ बुढ़िया तुम कौन हो ? मैं तुम्हें खा जाऊंगा ! मुझे बहुत भूख लगी है । बुढ़िया ने फिर उसके सामने हाथ जोड़ते हुए कहा – बाघ बेटा अभी मुझे खाने से तुम्हें क्या मिलेगा मेरा शरीर तो सूख चुका है , इसमें अब सिर्फ हड्डियां ही हड्डियां है , मांस तो है ही नहीं । मैं अपनी बेटी के घर जा रही हूं , वहां पर मैं बढ़िया खा – पीकर , मोटी -तगड़ी होकर जब वापस आऊंगी , तब मुझे खा लेना । तभी तो तुम्हें खाने का आनंद मिलेगा । बाघ ने कहा – मुझे बहलाने की कोशिश मत करो । बुढ़िया ने कहा – मैं तुम्हें नहीं बहला रही बेटा , मेरे तो शरीर में ताकत ही नहीं है , मैं तुमसे भला दुश्मनी कैसे कर सकती हूँ । तुम मेरा विश्वास करो मैं एक न एक जल्दी ही तुम्हारे पास जरूर आऊंगी , तुम मेरा इंतजार करना । बाघ ने कहा – ठीक है , मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा , भूलना मत तुम जरूर आना वरना तुम्हारा अंजाम बहुत बुरा होगा , मैं तुम्हें जहां भी छुपी होगी वहीं से ढूंढ लूंगा ।

बुढ़िया मन ही मन मुस्कुराते हुए आगे बढ़ी और अपनी बेटी के घर तक जा पहुंची , घर में पहुंचते ही उसने अपनी बेटी को गले से लगाया और खूब रोई । फिर बेटी ने उसका मान – सम्मान किया और उसके खाने के लिए अच्छे-अच्छे पकवान बनाएं । इस तरह महीनों तक बुढ़िया अपनी बेटी और दामाद के साथ हंसी-खुशी रहने लगी । बुढ़िया तंदुरुस्त हो गई । 1 दिन बुढ़िया ने कहा कि – बेटी मुझे यहां पर आए हुए अब बहुत दिन हो गए हैं , अब मुझे वापस घर जाना चाहिए । बेटी ने जिद की , कि आप और कुछ दिन रहे , आप इतनी जल्दी हमें छोड़कर नहीं जा सकती । बेटी की जिद करने पर मां ने कहा – ठीक है , मैं सिर्फ 1 दिन और रुकूँगी और फिर अपने घर चली जाऊंगी । बेटी ने कहा – ठीक है मां ।

अगले दिन सुबह बुढ़िया उठ कर नहा – धोकर जाने की तैयारी करने लगी । बेटी ने भी उसके लिए तरह-तरह के पकवान बनाकर खिलाएं , लेकिन वह चिंता में डूबी हुई थी , उसको चिंता में देख कर उसकी बेटी ने पूछा – क्या है मां तुम बहुत उदास हो ? मैं तो कहती हूं कि , तुम यहीं पर हमारे साथ ही सदा के लिए रुक जाओ आखिर वहां अकेली रह कर क्या करोगी । वहां तुम्हारा कोई सहारा भी नहीं है इससे अच्छा है तुम हमारे पास ही रह जाओ । बुढ़िया ने कहा – नहीं लाडो नहीं , बेटी के घर रहना उचित नहीं है , मुझे घर ही जाना है । मुझे एक बात की बहुत चिंता है , लेकिन मैं तुम्हें यह बताना नहीं चाहती थी । मैं उस मुसीबत से कैसे पार पाऊंगी यही मैं सोचती रहती हूं । बेटी ने कहा – मां आप मुझे बताइए आपको क्या परेशानी है । मैं आपकी परेशानी को जरूर दूर कर दूंगी । मां ने बेटी से कहा कि – जब मैं तुम्हारे घर आ रही थी तो , जंगल के रास्ते में मुझे चीता , बाघ और एक भालू मिला था । उन्होंने मुझे खाने की कोशिश की बड़ी मुश्किल से मैंने उन्हें मनाया कि मुझे अभी मत खाओ , अभी मेरे शरीर में मांस ही नहीं है , मैं अपनी बेटी के घर जा रही हूं और वहां से मोटी – तगड़ी होकर जब आऊंगी तब मुझे खा लेना । अब वो लोग मेरा इंतजार कर रहे होंगे , अब मैं उनसे अपना पीछा कैसे छुड़ाऊँगी इसी बात की मुझे चिंता है । थोड़ी देर सोचने के बाद बेटी ने कहा कि – तुम चिंता मत करो मां , मेरे पास एक उपाय है अगर तुम मेरे कहे अनुसार काम करोगी तो यह मुसीबत टल जाएगी ।

उसकी बेटी ने एक बड़ा सा गोल मटका खरीद लाया और नीचे की तरफ दो छोटे छेद कर दिए और ऊपर की तरफ भी दो छोटे छेद कर दिए और उसने अपनी मां को कहा कि- मां आप इस मटके में बैठ जाइए नीचे के हिस्से आप अपने दोनों पैर निकालकर धीरे धीरे चलना और सामने के छेद से आप रास्ता देख सकते हैं । जैसे ही वह आपके सामने आए आप रुक जाना और उनके चले जाने के बाद धीरे-धीरे आगे बढ़ना ऐसा कहकर बेटी ने अपनी मां को मटके के अंदर बिठाया और ढक्कन बांध दिया और घड़े को धकेलते हुए कहा – ”चल रे घड़ा घाटे – घाट “, ” चल रे घड़ा खाटे – घाट ” घड़ा धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए जंगल में आया थोड़ी देर में उसके सामने गुजरते हुए बाघ ने कहा – ए मटके तुमने एक बुढ़िया को देखा है क्या ? उसने कहा था मैं आऊंगी लेकिन आज तक नहीं आई । घड़े ने कहा – ” बुढ़िया देखे न गुड़िया ,” चल रे घड़ा घाटे – घाट , चल रे घड़ा घाटे – घाट ” और और घड़ा लुढ़कने लगी । थोड़ी ही दूर चलने पर उसका सामना भालू के साथ हुआ , भालू ने अपने लंबे बाल लहराते हुए और गुर्राते हुए कहा – ए मटकी तुमने एक बुढ़िया को देखा है क्या ? मटकी से आवाज आई – ” बुढ़िया देखे ना गुड़िया , चल रे घड़ा घाटे – घाट ” और धीरे-धीरे वह आगे बढ़ गई ।

अंत में उसका सामना चीता के साथ हुआ चीता जोर से छलांग लगाकर उसके सामने आ गया और पूछा ऐ घड़े तुमने एक बुढ़िया को देखा है क्या ? जो लाठी टेककर चलती है , उसने कहा था कि मैं जल्दी ही आऊंगी लेकिन इतने दिन हो गए वह आज तक नहीं आई मटके ने कहा – ” बुढ़िया देखे ना गुड़िया , चल रे घड़ा घाटे – घाट , चल रे घड़ा घाटे- घाट ” । ऐसा करते हुए बुढ़िया जंगल से पार हो गई । जंगल के बाहर आते ही मटका फोड़ कर बुढ़िया बाहर आ गई और खुशी से झूमने लगी और फिर वह अपने घर पहुंच गई ।

शिक्षा :- कितनी भी विपरीत परिस्थितियां हो हमें अपना धैर्य नहीं खोना चाहिए तथा सदैव समस्याओं को हल करने के बारे में सोचना चाहिए ।

पारंपरिक छत्तीसगढ़ी लोककथा
पुरुषोत्तम साहू

New hindi story for kids । किस्मत मेहरबान तो गधा पहलवान

एक गांव में एक लड़का रहता था भोलाराम , तकरीबन 10 साल का , जैसा नाम वैसा ही काम , बहुत ही भोला – भाला और कमजोर बुद्धि का बालक , दुनिया की चतुराई से अनभिज्ञ । उसकी मां का निधन हो चुका था , उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली थी । उसकी सौतेली मां उसे अच्छे से संभालती थी । लेकिन कुछ ही दिनों बाद उसकी सौतेली मां के बच्चे हुए । धीरे-धीरे उस सौतेली मां का व्यवहार बदलने लगा और वह उसे तरह-तरह से प्रताड़ित करने लगी लेकिन वह लड़का बहुत भोला-भाला था उसे यह बात समझ नहीं आती थी । वह अपनी मां के बताए अनुसार ही चलता था उसके मन में अपनी मां के प्रति कभी भी द्वेष की भावना नहीं आई । घर पर ही रहता था और अपनी मां के साथ और अपने पिता के साथ काम करने में मदद करता था ।

कुछ सालों बाद उसके बाकी के भाई – बहन बड़े हो गए और वह लड़का जवान हो गया था । अब उसकी शादी करने की उम्र हो चुकी थी , वह गोरा और गठीले बदन वाला एक नौजवान बन गया था । पिता ने जब उसकी मां के सामने भोलाराम के विवाह की बात की तो , सौतेली मां ने सोचा कि जब इसका विवाह हो जाएगा और इसका परिवार बस जाएगा तब आज नहीं तो कल इसे जायदाद में हिस्सा भी देना पड़ेगा । इसलिए उसने उसे मारने का षड्यंत्र रचा उसके पिता बहुत भोले – भाले थे और दिन भर खेतों में काम करते रहते थे । इसलिए उनको इस बात की भनक नहीं लगी ।

एक दिन उस सौतेली मां ने लड्डू और पूरी बनाएं और एक पोटली में पूड़ी और लड्डू बांध कर जंगल के रास्ते अपने मामा के घर संदेश पहुंचाने के लिए बहाने भोलाराम को भेजने का उपाय किया । षड्यंत्र के तहत उसकी मां ने उसके लड्डू में जहर मिला दिया था उसने लड़के से कहा कि तुम्हें जब रास्ते में भूख लगेगी तब तुम इसे खा लेना और आधी रोटी और लड्डू अपने मामा के घर ले जाना । लड़का अपनी मां की बात मानकर सुबह – सुबह ही नहा धोकर तैयार होकर पोटली लेकर अपने मामा के घर संदेशा पहुंचाने के नाम से घर से निकल पड़ा । चलते – चलते वह जंगल तक पहुंच गया । गर्मी का दिन था इसलिए उसे बहुत ज्यादा थकान लग रही थी ।

जब वह जंगल के बीच में पहुंचा तो वह बहुत ही थक चुका था । उसने सोचा कि यहां पर थोड़ी देर आराम कर लेते हैं । उसने एक छोटे झरने के किनारे बड़े से पत्थर पर अपनी पोटली रखी और पत्थर की खोह में आराम करने लगा थोड़ी देर बाद वहां एक हाथी आया । हाथी लड्डू की सुगंध पाकर पोटली के पास पहुंचा । हाथी ने सूंड से उस पोटली को खोल दिया और उसमें के लड्डू और पूड़ी खा लिए । इस बीच उस लड़के की नींद भी खुल गई और उसने देखा कि वह हाथी उसके खाने को बर्बाद कर रहा है , गुस्से में आकर उसने हाथी को मारना शुरू किया । हाथी ने उसे अपनी सूंड में लपेट लिया वह अपने मुट्ठी से उसके सिर पर बार – बार वार कर रहा था । उधर से राजा की सेना उस हाथी का पीछा करते हुए आ रहा था और जोर-जोर से चिल्ला रहे थे । उन्होंने देखा कि एक लड़का हाथी को कैसे मार रहा है , थोड़ी ही देर में वह हाथी जहर के प्रभाव से गिर पड़ा और थोड़ी ही देर में उसकी मृत्यु हो गई ।

सिपाही चिल्लाने लगे कि यह बहुत बलवान लड़का है ,जिसने अपने मुक्के के प्रहार से इस विशालकाय हाथी को मार दिया और वे नाचने लगे । सिपाहियों ने उस लड़के को बताया कि यह राज दरबार का हाथी है कुछ दिन पहले ही पागल हो गया और राज दरबार से भागकर लोगों को घायल कर रहा था । इसलिए हम इसे पकड़ने आए थे राजा ने इस हाथी को मारने के आदेश दिए हैं । इस हाथी ने लोगों को बहुत परेशान कर रखा था लेकिन तुमने इसे अपने बाहुबल से मार दिया , तुम बहुत महान हो ।

सिपाहियों ने कहा कि राजा बहुत खुश होंगे, तुम्हें बहुत सारे इनाम मिलेंगे , तुम अभी हमारे साथ चलो । लड़का सिपाहियों के साथ चला गया उसने सोचा कि मुझे इनाम में जो धन मिलेगा उसे मैं अपने घर में ले जाऊंगा तो मेरे माता और पिता बहुत ही खुश होंगे । सिपाहियों के साथ वह लड़का राजदरबार में पहुंचा । सिपाहियों ने सारी बात राजा को बता दी , राजा बहुत खुश हुए और उसे 100 सोने की स्वर्ण मुद्रा इनाम के रूप में प्रदान की ।

राजा ने पूछा कि तुम क्या काम करते हो ? लड़के ने कहा – मैं अपने पिता के साथ खेतों में काम करता हूं । राजा ने कहा – तुम बहुत बहादुर हो , तुम बहुत ही शक्तिशाली हो , तुम्हें हमारे दरबार में एक वीर योद्धा के रूप में होना चाहिए । लड़का यह सुनकर बहुत ही खुश हुआ और उसने राजा की बात मान ली और वहां पर सैनिक का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया । उसकी मेहनत को देखकर राजा ने उसे सेना की एक टुकड़ी का सेनापति बना दिया । इधर बहुत दिनों तक उस लड़के की कोई खोज – खबर नहीं थी । इसलिए उसके परिवार वालों ने उसे मृत मान लिया और उसकी सौतेली मां मन ही मन बहुत ही खुश होने लगी ।

थोड़े ही दिनों बाद एक शेर ने राजा के राज्य में उत्पात मचाना शुरू कर दिया और लोगों को मारना शुरू कर दिया । राजा ने तुरंत ही अपनी सेनाओं के सेनापतियों को आदेश दिया कि उस शेर को ढूंढ कर मार दिया जाए । भोलाराम भी अपनी टुकड़ी के साथ उस शेर को पकड़ने के लिए जंगल में छान मारने लगा । एक दिन जब वह अपनी सेना के साथ शेर को ढूंढ रहा था तब उसी जंगल में एक किसान मिला । किसान ने उससे कहा कि – सेनापति जी मेरा एक बैल घर से भागकर घने जंगल में आ गया है , मैं उसे तलाश करते -करते थक गया हूं । अगर आप लोगों को वह बैल मिल जाए तो उसे आप अपने पास रख लीजिएगा और मेरे गांव में मुझे सूचना भिजवा दीजिएगा ।

सेनापति ने किसान से कहा कि – आप चिंता मत करिए अगर वह बैल हमको मिला तो हम उसे अवश्य ही आप तक पहुंचा देंगे , अब आप अपने घर चले जाइए अकेले जंगल में भटकना ठीक नहीं है । रात होने पर वे पेड़ों के ऊपर सो जाते थे और कुछ सैनिक नीचे तंबू बनाकर निगरानी करते थे । उसी दिन रात को सेनापति को एहसास हुआ कि , कोई जानवर उसके पेड़ के नीचे खड़ा है , उसने ध्यान से देखा और कहा अरे यह तो किसान का बैल है । रस्सी का फंदा लेकर भोलाराम ने उसके ऊपर छलांग लगा दी और उसकी गर्दन को रस्सी से लपेट दिया सभी सैनिक भी उसके पीछे-पीछे उस पर टूट पड़े । रात के अंधेरे में भगदड़ मच गई सैनिकों ने बड़े – बड़े जाल फेंक कर उसको पकड़ लिया ।

सभी सैनिकों ने मशाल जलाई तब उस लड़के ने देखा , अरे यह तो खूंखार शेर है ! उसकी बोलती बंद हो गई लेकिन सारे सैनिक उसकी जय-जयकार करने लगे । शेर को पिंजरे में कैद कर राजा के पास लाया गया । भोलाराम के इस कारनामे को देखकर राजा अत्यंत ही प्रसन्न हुए , उन्होंने उसे अपने राज्य का मुख्य सेनापति घोषित कर दिया । उसकी बहादुरी को देख कर अतिसुन्दर राजकुमारी इतनी प्रसन्न हुई कि उन्होंने उससे विवाह करने की घोषणा कर दी ।

राजा ने भी खुश होकर उनके विवाह को मंजूरी दे दी । इस तरह राजकीय ठाठ – बाठ से उसका विवाह संपन्न हुआ । वह अपनी नई – नवेली दुल्हन को लेकर सैनिकों के बेड़े के साथ अपने गांव की ओर रवाना हुआ । उसके गांव के लोग उसे देखकर हक्के – बक्के रह गए । जब वह अपने घर के पास जाकर खड़ा हुआ तो उसकी मां और पिताजी उसको देखकर सन्न रह गए । सौतेली मां के पैरों तले तो मानों जमीन ही खिसक गई ।

उसके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला । लड़के ने अपनी सारी बात अपने परिवार वालों की बताई और कहा कि आज से हम राज महल में रहेंगे , मैं आप सबको लेने के लिए आया हूं । यह बात सुनकर उसकी सौतेली मां को मन ही मन बहुत पश्चाताप हुआ और अपने आपको कोसने लगी और खूब रोई , उसने उसके साथ राजमहल जाने के लिए इंकार कर दिया । लेकिन उस लड़के की बार-बार जिद करने पर वह जाने के लिए मान गई और उसके बाद उसने कभी भी उस लड़के और उसकी पत्नी के बारे में कभी भी अपने मन में बुरे विचार नहीं लाएं इस तरह सभी लोग राजमहल में हंसी – खुशी रहने लगे ।

पारंपरिक लोककथा
पुरुषोत्तम साहू

सोने का फल

बहुत पहले की बात है ,एक छोटा सा गांव था, उस गांव के लोग खेती किसानी का काम करते थे । जिनके पास खेत नहीं होता था , वे भेड़ ,बकरी और गाय -भैंस चराने का काम करते थें ।  दूध ,दही , गोबर और कंडे बेचकर वे अपना गुजर बसर करते थे । उसी गांव में सुखराम नाम का आदमी रहता था , उसके पास खेत नहीं था । उसके पास बहुत सारी बकरियां थी , हरदिन वो उन्हें जंगलों में ले जाकर चराता था , और शाम होने पर अपने गांव लौट अाता था । बकरियां जंगल में जाकर , हरे-हरे पत्ते और घास को खाकर उछल-कूद करते हुए घर को लौट आती थी । 1 दिन की बात है , सुखराम अपनी बकरियों को लेकर जंगल में बहुत दूर निकल गया जेठ का महीना था । सूर्य की किरणें आग की तरह तप रही थी , गर्मी के कारण बहुत धुल उड़ रही थीं । जमीन भी कोयले की अंगारों जैसा प्रतीत हो रहा था । उसके आसपास पानी का कोई स्त्रोत नहीं था , सुखराम को बहुत प्यास लग रही थी । सुखराम प्यास के कारण  वही एक पेड़ के नीचे तड़पने लगा ।  बकरियां उसी के आसपास फैल कर चरने लगी , कुछ समय पश्चात भगवान श्री शंकर महादेव वहां पर आए और उन्होंने सुखराम को प्यार से तड़पते हुए देखा । भगवान श्री शंकर ने एक ऋषि का वेश धारण किया और अपने हाथ के कमंडल में पानी लेकर उसके पास पहुंच गए ।ऋषि ने पूछा क्यों सुखराम तुम क्यों तड़प रहे हो  ? सुखराम ने कहा – क्या बताऊं महाराज प्यास के मारे मेरे प्राण निकल रहे हैं । भगवान शंकर को उस पर दया आ गई , उन्होंने अपनी कमंडल का पानी सुखराम को पीने के लिए दिया और अपनी थैले से निकालकर कुछ फल सुखराम को खाने के लिए दे दिया । सुखराम ने कुछ फल खाया और पानी पिया । सुखराम का मन शांत हुआ और उसने बचा हुआ फल अपनी पोटली में रख दिया । दिन भर में थका हुआ सुखराम साँझ होने पर घर को लौटने लगा । घर लौटने पर उसने अपनी पत्नी सुखिया से बातचीत की और बचा हुआ फल रसोईघर के पाट के ऊपर रख दिया । रात में खाना खाने के बाद वह लोग सो गए , सुबह अगले दिन मुर्गे की बांग के साथ उसका नींद खुल गया । हाथ मुंह धो कर सुखराम रसोईघर में गया और पाट में रखे हुए फल को देखा । फल को देखकर वह सन्न रह गया साधु के दिए हुए फल सोने के बन गए थे , उसने उस फल को चुपचाप कपड़े में लपेट कर और बकरियों को लेकर जंगल की ओर चला गया । सुखराम मन ही मन बहुत बहुत गदगद हो रहा था , लेकिन कभी-कभी उसके चेहरे पर डर के भाव भी दिखाई दे रहे थे । दिनभर बीतने के बाद शाम को वह फिर घर आया । उसके बाद खाना खाकर सो गया , लेकिन रात भर उसे नींद नहीं आई । दूसरे दिन सुबह – सुबह ही वह उठ गया और अपनी पत्नी को कहा कि आज मुझे शहर में कुछ काम है ।  मैं आज जंगल में बकरी चराने नहीं जाऊंगा , आज तुम चली जाना । सुखिया ने जल्दी –  जल्दी घर का काम किया खाना खाया और बकरियों को लेकर जंगल की ओर निकल गई । सुखराम भी अपनी पोटली पकड़कर शहर की तरफ चला गया । शहर में पहुंचने के बाद सुखराम जल्दी-जल्दी एक सुनार के दुकान पर पहुंचा और उसने अपनी पोटली से सोने का फल निकालते हुए सुनार को दिया । सुनार चमचमाते सोने के फल को देखकर चकित रह गया । उसके मन में लालच आने लगा उसने पूछा इसे तौलना है क्या ? सुखराम ने झट से कहा – हां भैया इसे जल्दी से तौल दो और मुझे पैसा दे दो । सोनार ने सोने के फल को तराजू पर रखा और उसे रुपयों की गड्डी थमा दी । सुखराम ने कुछ भी सवाल जवाब नहीं किया और उल्टे पांव अपने घर वापस आ गया । इतने सोने की कम भाव देकर सुनार बहुत खुश हुआ और उसने सुखराम को कहा कि मेरे पास दोबारा जरूर आना , मैं पूरे शहर में तुमको सबसे अच्छा भाव दूंगा । सुखराम ने घर आकर सारी बात अपनी पत्नी सुखिया को बताई और रुपयों को गड्डी उसके हाथों पर रख दी । उसके बाद उन्होंने अपने घर के लिए नए-नए बर्तन खरीदें , नए कपड़े खरीदी , सुखिया ने अपने लिए बहुत से महंगे – महंगे जेवर  खरीदी । बहुत सारी बकरियां खरीदी और कुछ दिनों में उन्होंने अपने लिए एक बड़ा सा सुंदर घर बनवा लिया , उनकी इस अमीरी को देखकर गांव में चर्चा होने लगी कि यह लोग कुछ ही दिनों में इतने अमीर कैसे हो गए । दोनों बहुत बोले थे उन्होंने लोगों के बार बार पूछने पर बता दिया तथा अपनी सच्चाई को साबित करने के लिए वह सोने का फल भी लोगों को दिखा दिया । एक दिन उनके घर पर चार लोग आए और उन्होंने कहा हमने आपके बारे में बहुत कुछ सुना है ,क्या आप लोग सच बोल रहे हैं ? हम वो सोने का फल देखना चाहते हैं । क्या आप जो कह रहे हैं ,  वह वाकई सच है ? सीधे – साधे सुखराम ने उन चारों को सोने का फल दिखाकर पूरी कहानी बता दी । उसी रात  को उनके घर में चोर घुस आए , उन्होंने सुखराम के सोने के फल को चुरा लिया लेकिन खटपट की आवाज होने पर सुखराम की नींद खुल गई और उन्होंने उन चोरों को पहचान लिया , कि यह वही लोग है जो सुबह फल के बारे में पूछने के लिए आए थे । गांव में सुखराम के घर चोरी होने का हल्ला मच गया था । सुखराम सुबह-सुबह ही पंचायत में पहुंच गया और उसने सारी बात बता दी पंचायत ने उन चारों लोगों को बुलाया और पूछा कि क्या तुमने सुखराम के सोने का फल चुराया है  ? उन लोगों ने चोरी करने की बात स्वीकार नहीं की लेकिन पंचों के धमकाने के बाद वे डर गए और उन्होंने चोरी करने की सारी बात पंचायत के सामने कबूल कर ली । चोरों को चोरी किया हुआ फल लाने के लिए कहा गया उनमें से एक गया और छुपाया हुआ सोने का फल पोटली सहित लेकर आ गया । पंचों ने उस पोटली को खोल के देखा तो उसमें कच्चे फल थे । यह देखकर सभी आश्चर्यचकित हो गए । उन फलों को सुखराम को वापस कर दिया गया और चोरों को गांव से बाहर निकाल दिया गया । सुखराम वह फल देखकर निराश हुआ और अपनी पत्नी के साथ घर वापस आ गया , उसने वह फल वापस रसोईघर के पाट के ऊपर रख दिया । लेकिन यह क्या,  वह फल फिर से चमचमाते हुए सोने के फल में बदल गए यह देखकर सुखराम और सुखिया बहुत खुश हो गए और खुशी से नाचने लगे ।