मानसून एक दिन पहले आ गया ।new hindi story 2020

क्या कहा ? मैं एक दिन पहले आ गया । अरे हां भई तो इसमें कौन सा पहाड़ टूट पड़ा । मेरे साथ तो बादलों के , हवाओं के , लंगर - लश्कर साथ में होते हैं ना । क्या कहा मेरी रंगत बदल गई है । बिल्कुल ठीक कहा तुमने , सब कुछ तो बदल गया ।

सैकड़ों वर्षो पहले मेरी मनुहार की जाती थी ।मल्हार राग की रचना करने वाले तानसेन से ही पूछ लो ।कितने प्यार से , लाड़ -दुलार से , मुझे न्यौता दिया जाता था ।

कभी हवन के सुगंधित सामग्रियों की सुगंध द्वारा मुझे रिझाया जाता तो कभी मंत्रोच्चार द्वारा मुझे संदेश भेजा जाता । और मैं भी झूम - झूम कर बरसता था । और कालिदास की " मेघदूत " कृति से मैं संदेशवाहक की भूमिका भी निभाता था।

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देश - काल , समय के अनुसार मुझे भी बदलना पड़ा । मुझे तो बादलों के ढोल - नगाड़ों की थाप पर , पानी की बूंदों का सेहरा बांध वसुधा की पत्तियों पर , शाखों पर , पर्वत - पहाड़ों पर , थिरकना भाता है ।

जब मैं बरसता हूं तो पानी की बूंदों के साथ ताल , तालाब , नदियां , समंदर सभी खुश रहते हैं । अरे मानुष की बात तो छोड़िए , पशु - पक्षी सब प्रसन्न होते हैं । पशुओं की खाल पर से मैं गुदगुदी करते फिसलता हूं तो ऊंचे परवाज वाले पक्षियों के पंखों पर पूरे आकाश भी घूम आता हूं ।

बदलते वक्त के साथ इतना कुछ बदल गया । मेरे राह के साथी घने जंगलों , निरीह वृक्षों को जब काटा गया तो भला मेरा सृजन कैसे होगा ? दुष्परिणाम मेरा उत्पादन कम होता गया ।

पहले तो पग- पग में छोटे- बड़े कानन ,जंगल वृक्ष मेरी अगवानी में खड़े मिलते थे । पहाड़ों के घर मेरा ठौर हुआ करता था । वसुधा के जलवाष्प पहले मेरे घर गर्मियों में छुट्टी मनाने आते हैं , फिर उन्हीं की ठंडक से बादलों की तश्तरी में सजा कर फिर धरती की ओर बारिश के रूप में मुझे परोसा जाता था ।

अहा जब मैं गांव , शहर , खेत - खलिहानों में बरसता हूं तो पूरी धरती धानी चुनर ओढ़ कर शर्माती फिरती है । किसानों के , बैलों के चेहरों की रंगत देखते ही बनती है । मेरी आगवानी में बागों में झूले भी बांधे जाते हैं , और कितनी कागज की कश्तियों को मेरा इंतजार रहता है , यह बच्चों से पूछ लो ।

कितनी नवविवाहिताएं पीहर से संदेश भेजती है । यह उनकी कलाइयों की चूड़ियों से पूछ लो ..... । अरे भई मैं तो सदियों से समय का पाबंद रहा हूं । पर आज मेरी रफ्तार जरा सी तेज करनी होगी ना ।रास्ते में व्यवधान कितने हैं ? अम्लीय वायु मेरे भीतर बिना मेरी इजाजत के आ जाता है और अम्लीय वर्षा के रूप में मैं बदनाम होता हूं ।

हजारों कारखाने से उठते प्रदूषित वायु से मैं खाँस - खाँस कर बेहाल हो जाता हूं । ऊपर से भयानक प्रदूषण जगह-जगह मेरा रास्ता रोके खड़े रहते हैं । बताओ इतनी बाधाओं से भला एक अकेली जान कैसे निपटें ?

गगनचुंबी इमारतें , कटते वन ,कारखानों से निकले धुँए से मेरा जीना दूभर हो गया है । पर मैं अपने कर्तव्य से कैसे मुंह मोड़ मलूँ । मुझे जिस कार्य के लिए सृष्टि ने रचा है उस कार्य को तो मुझे हर हाल में करना ही है ।

मानव जाति गलतियों पर गलतियां किए जा रही है मैं बस खामोशी से सह रहा हूं । और ऊपर से दुनिया जहान के ताने कि मैं बदल गया हूं । खंड वर्षा करता हूं । कहीं अकाल तो कहीं भुखमरी ला रहा हूं । यह सुन - सुन कर मेरी आत्मा छलनी हो जाती है ।

भला मानव जाति जिनका अस्तित्व मेरे से ही है तमाम इतिहास , संस्कृतियों का गवाह और उद्गम स्रोत मैं हूं यह जान कर भी क्या मैं वादा खिलाफी कर सकता हूं ? मेरा पोर - पोर अब दुखने लगा है । मैं तो सृष्टि के प्रारंभ से ही अपना कार्य करता आया हूं पर अब इतनी थकान , अरुचि जो अभी हो रही है वैसी पहले कभी नहीं हुई थी ।

जहरीले हवा वातावरण में घुली हो ऐसा ही नहीं है अब तो मेरे ही बच्चों की शहादत वाले बारूद की गंध मेरी शरीर में नासूर की तरह चुभ रहे हैं । कहीं आतंकवाद तो कहीं नक्सली बारूदों का प्रयोग कर रहे हैं ।

मानुष गंध , चीथड़ों के कण , हजारों यतीम बच्चों के उदास आंखें , शहीदों के मांओ के " आंसू से रिक्त आँखे " उन सबके चुभते प्रश्नों का सामना करते - करते मैं थक चुका हूं । सिर पकड़ कर बैठे किसानों के कुम्हलाये चेहरे मुझे रुला देते हैं । पर मेरे आंसू कहां सबको दिखते हैं ? वो तो बारिश में भूल जाते हैं ।

अब तो मेरी तासीर नाली में बहते पानी जैसे हो गई । पर मैं तुरंत उठता हूं पूरे जोश के साथ , बादलों के लंगर लश्करों के साथ , तमाम शहीदों के खून से रंगी वादियों , किसानों की उदासी , तालाबों की मायूसी , पशुओं की पीड़ा , पेड़ों के अंतरनाद , मानव जाति के चित्कार , इन सब को धोने की उनके चेहरों पर फिर से खुशहाली दिख जाए इसी आशा के साथ मैंने अपनी रफ्तार बढ़ा दी है । तभी तो एक दिन पहले आ पहुंचा हूं । और लोग कहते हैं कि मानसून एक दिन पहले आ गया ।

new hindi kahani_ईब के शहरिया पेड़ ना होईब

ईब के शहरिया पेड़ ना होईब

आज तो मेरी पत्तियाँ भी झुलस रही हैं । अरे गर्मी से नहीं । उस सूरज महाराज की कृपा है । जो मछुआरा बन पानी को फांसता फिर रहा है । ए.सी. से गर्म हवाओं ने मुझे पूरी तरह से झुलसा ही दिया है । क्या कहा ? जरा जोर से बोलो। मेरी उम्र हो चुकी है और आजकल मैं जरा ऊंचा सुनता हूं । नाम ? नाम मेरा पेड़ ही तो है , अच्छा तुम चाहो तो शहरिया पेड़ कह सकते हो । मेरी पहचान , मेरी पैदाइश , मेरा कुल , गोत्र सब बताता हूं भई । जरा धीरज तो धरो…। मेरी पैदाइश यही शहर दीवार के पीछे ही हुई थी । मेरी नन्हीं कोंपलों का अन्नप्राशन धूल व बारिश के रीसते पानी से ही हुआ था । हाँ आए थे । बहुत से मेहमान । जिस घर के पिछली दीवार पर मैं उगा था ना वहां की कंचों सी आंखों वाला बच्चा जो झांक – झांक कर मुझे देखता था । बच्चा शायद सोचता था कि बिना गमले , मिट्टी के भी भला कोई पौधा उगता है क्या ? उसने तो शहर में महंगे कलेवर वाले गमलों में , नर्सरी से मंगाई गई नाजुक पौधों को ही देखा था । कंपोस्ट खाद के बिना जिनका अस्तित्व ही नहीं हो सकता है । भई हमारा क्या ? हम तो बहादुर शाह जफर की गजल सरीखे हैं ” ना किसी के आंख का नूर हूं , ना किसी के घर का चिराग हूं । ” कुछ गलत कहा हो तो माफ करना , भई मैं जरा ऊंचा सुनता हूं और मेरी याददाश्त भी जरा सुस्त हो रही है ।

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हां तो हम कहां थे ? मेरे अन्नप्राशन में तो घर की मालकिन भी थी । पड़ोसन भी आई थी । घर की मालकिन को हमारा जन्म लेना जरा भी नहीं सुहाया था ।वो बुदबुदाती थी ” मुआ जाने कहां से उग आया । ” और हम अवतरित भी ऐसे स्थान पर हुए थे कि उनका हाथ हमारे गले तक नहीं पहुंच पा रहा था । अगर हम गिरफ्त में आते तो कब के काल कलवित हो चुके होते ।

अब रही हमारी बात हमारे गोत्र की तो हम बताये देते हैं हम पीपल के वंशज हैं । हमारे सहोदर आसपास के देवालय , मंदिरों , तालाब पार में आपको दिख ही जाया करेंगे । हमारे पूर्वजों की तो शान ही निराली थी । अब रही बात हमारे मिजाज की तो भई अब हम शहर में हैं तो शहरिया ही कहलायेंगे ना ….। क्या कहा अब बदसूरत , अवांछनीय है ?ठीक ही सुना । अगर मन्नत में मांगे गए होते तो आज किसी देवी स्थान , मंदिर , देवालय के या किसी शानदार ड्राइंग रूम में अपने हाथ पैर नुचवाकर कर “बोनसाई” बनकर पसरे होते । खैर भ्रूण हत्या की कोशिश भी हमारे साथ भी की गई थी ।

शहर की इमारत के मलमल में हम भैया ” टाट के पैबंद ” । तो हमारी हत्या के लिए क्या-क्या जतन किये गये । किसी ने दीवार से गरम पानी रितोया ( बहाया ) , किसी ने एसिड । पर दीवार से ऊपर से नीचे बहते तक कुछ अंश ही हमारा जला । पर कोख बची रही जिससे पुनः नई जड़े फूटी….। जवानी हममें भी ऐसी आयी कि गमले में उगे पौधों की जवानियां भी अश- अश कर उठे । गदराया यौवन , बलिष्ठ शाखाएं , हरीतिक्त पत्तियां ऐसे लचकती थी । जैसे कि इनकी नोकों पर नटनी करतब दिखा हो रही हो । शाखाएं ऐसी कि गमले के पौधों को जिम जाने पर भी ऐसी सुपुष्षट बॉडी ( देह ) ना मिले । रंगत का क्या कहना । कहीं गहरा हरा , कहीं पीला , कहीं ललछौंवा तो कभी सुनहरे रंग की दिखती है मेरी पत्तियां ।

शहर की दोपहरी में जब सूरज मछुआरा पानी को फांसता फिरता है तब भी हमारी लुनाई देखते ही बनती है । ” इस सूरज के घनत्व में तरलता है तो वह हमारी छांव है । जब धूप चढ़ती है और धूप में छाँव के बंटवारे होते हैं । तो हमारी पत्तियां बिल्कुल खामोश रहती है । सबसे ऊपर की शाखों पर धूप की कड़ाही में मेरे पत्ते तले जाते हैं तो उन्हें उनके घपचियानेको लेकर कोई मलाल नहीं होता । क्योंकि नीचे की पत्तियों को सूरज छांव जो बांटता है । ”

गमले के पौधों के ऊपर तो हरी तालपतरी तानी जाती है फिर भी वो बेचारे झुलस जाते हैं । कीड़े – मकोड़े , पक्षियों , कौओं की बारात मेरे बदन पर ऐसे नाचते हैं जैसे कि महादेव की बारात में भूत , परेत , मसान , पिशाच नाचा किये होंगे । जिसे जहां ठौर मिला वो वहां अपना आसरा बना लेता है । भई हमको तो गमलों के पौधों से बड़ी उलझन होती है ।मुआ एक कीड़ा उनकी देह पर चढ़ा नहीं की महंगी दवाइयों का छिड़काव उन पर हो जाता था । अब तो गिलहरियों को भी हमने न्योता दे दिया है ।

क्या कहा ? शिक्षा – दीक्षा हम कभी स्कूल गये ही नहीं । मंदिर के घंटियों से जागना, चिड़ियों के चहचाहट से गिनती , हमारी भाषा ” धूप – धूप में छाया के अनुवाद से होती है ।” मौसम के अखबार में हमारा रिजल्ट निकलता है । बारिश में तिमाही तो ठंड में छःमाही की परीक्षा होती है । हम बोर्ड की परीक्षा में तभी उत्तीर्ण माने जाते जब पतझड़ में गिरे पत्तों से दोगुने नए पत्ते हमारी देह की अंकसूची में नंबर भरते । कीड़े , मकोड़े , पक्षी , कौंवे , गिलहरी ही हमारे परीक्षक हुआ करते हैं । जो बिना लाग लपेट मौसम के पंचांग में हमारा रिजल्ट छाप देते हैं ।

शहर में उगने के कारण हमने इसके भारी कीमत चुकाई है । गांव के पीपल में जहां जुगनूओं की बारात सजती है यहां शहर में हमारे तन पर बल्बों की झालर लपेट दी जाती है । इनकी तपिश से मेरे बदन में छाले पड़ जाते हैं । पर इनसे उनको क्या ? ” बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना ” जैसे झालर का सेहरा बांध मैं भी नाच लेता हूं । आज मैंने ऊंची आवाज में कुछ कहने की आवाज सुनी । अब इस पेड़ को काटना ही पड़ेगा । बेकार की गंदगी फैलाता है । जब देखो तब जगह मांगता फिरता है । कभी इस डंगाल ( शाखा ) को कभी उस डंगाल के लिये । और इस मुस्टंडे पेड़ की मुस्टंडई तो देखो खा – खाकर मुटा रहा है । हाँथ – पाँव ( जड़ों ) को फैला रहा है । रामसेतु बन गया है । जिस पर फुदकती गिलहरियां छत पर सुखाई गई गेहूं को खा रही है, मिर्च कुतर रही है और तो और इसकी दादागिरी को देखो । इसकी छाँव अब गमलों के पौधों पर ” बेजा कब्जा ” किए जा रही हैं ।

मेरा तो डर के मारे काटो तो खून नहीं । हे प्रभु मेरी अर्जी कौन सुने ? पर अगले ही दिन दो पेड़ कटईया आये । दोनों ने मेरे अनावृत्त यौवन को तौला,परखा । फिर कहा अभी इससे कोई खतरा नहीं । इसकी टहनियों को काँट – छाँट कर जरा छोटा कर देते हैं । फिर क्या था । चीरहरण हुआ मेरा , मेरे तन को ढकने वाली शाखाओं,पत्तियों को मेरे तन से हटा दिया गया । मैं शर्म से पानी- पानी हो गया । जाने उन्होंने मुझे जीवित क्यों छोड़ा ? रोज रात को आक्सीजन देने वाला मैं खुद को ही आज निष्प्राण सा महसूस करने लगा हूं । ” मौसम के हरकारे आते , पत्ते डाकिया बन संदेश सुनाते, गिलहरी सुख-दुख बांचती ” । समय बीतता गया । शहर की धूल , ए.सी. की हवा से मेरी सेहत अब खराब रहने लगी । मेरी उम्र हो रही है । पर आज तो समय से पहले ही मृत्यु आ गई हो । ऐसा लग रहा है । बड़ी सी आरि , दरांती लिए दो यम के दूत मेरी ओर बढ़े चले आ रहे हैं । मेरी जड़ों के मकान के टॉयलेट को जाम कर दिया था ना । आज मेरी हत्या निश्चित थी । पर मरने से पहले मैं अपनी वसीयत करना चाहता हूं ।

मेरी अस्थियाँ किसी मंदिर में रख दी जायें और कोख ( जड़ों ) को किसी गांव में रोप दिया जाय , मेरी अस्थियों से किसी बूढ़े को लाठी मिल जाये , मेरी जड़ के सत्व से किसी मरीज का भला हो जाये । एकाध कोपल किसी चौराहे पर रोप दी जाये । जहां ये अपनी शाखाओं से ,जटाओं से बच्चों की खिलखिलाहट , गिलहरियों की फुदकन , पनिहारिनों का कलश ठौर , संध्या दीपक रखने का अलाव बन सकूं । जानता हूं , यह बहुत बड़ी ख्वाहिश है । मेरा गुनाह मुझे पता है कि मैं पेड़ हूं वह भी शहरिया । शहर के कंक्रीटों भयावह जाल में मुझ जैसे पेड़ का भला क्या काम ? पर पेड़ तो पेड़ होता है ना?

प्रकृति रोप दे जहां भी जिसको,
पेड़ वहीं का बाशिंदा हो जाता है ।
ना करो शक मेरी नियत पर,
पेड़ कभी गंवईया ना कभी शहरिया होता है ।
दे दे जो एक मुट्ठी माटी और एक मुट्ठी आकाश,
पेड़ उसी का हमसाया हो जाता है ।
पेड़ ना कभी गंवईया,
ना कभी शहरिया होता है…………….।

चतुर बेटी। Intresting story for kids 2020।

बहुत समय पहले की बात है ,एक गांव में एक बुढ़िया रहती थी, वह बहुत उदास रहती थी । वह हर समय अपनी बेटी की यादों में खोए हुए रहती थी । उसकी इकलौती बेटी का विवाह पिछले वर्ष ही पास के ही एक गांव में हो गया था । वह अपने बिटिया के घर जाना चाहती थी , किंतु उसके गांव के रास्ते में एक घनघोर जंगल पड़ता था । उस जंगल को पार करने के लिए लोग डरते थे, वहां खूंखार जंगली जानवर भटकते रहते थे । इस तरह बुढ़िया कई दिनों तक सोचती रही । एक दिन उसने निश्चय कर लिया कि अब कुछ भी हो जाए मैं अपनी बेटी के घर जरूर जाऊंगी और ऐसा सोचकर अगले ही दिन सुबह वह एक पोटली में कुछ खाना और कपड़े लिए हाथ में डंडा पकड़े घर से निकल गई ।

कुछ दूर चलने के बाद जंगल शुरू हुआ जंगल में घुसते ही उसका कलेजा कांपने लगा ।फिर भी बेटी के याद में उसने अपनी हिम्मत बढ़ाई और धीरे-धीरे जंगल में सावधानी से आगे बढ़ने लगी । कुछ ही देर बाद उसके सामने गुर्राता हुआ एक चीता आया । उस चीते ने कहा – ऐ बुढ़िया तुम कहां जा रही हो ?? मैं बहुत भूखा हूं । मैं तुम्हें खा जाऊंगा । बुढ़िया को तो जैसे काटो तो खून नहीं ! उसके मुंह से आवाज नहीं निकल पा रही थी ,उसके हाथ पैर कांपने लगे । लेकिन तभी बुढ़िया ने अचानक कहा कि – बेटा मुझे खाने से तुम्हें क्या मिलेगा ? मेरे शरीर में तो माँस ही नहीं है , सिर्फ हड्डियां ही हड्डियां है । तुम मुझे बाद में खा लेना , मैं अपनी बेटी के घर जा रही हूं । मैं वहां से बढ़िया खा – पीकर मोटी – तगड़ी होकर जब वापस आऊंगी, तब तुम मुझे खा लेना । चीता ने कहा – तुम मुझे बेवकूफ तो नहीं बना रही हो ? बुढ़िया ने कहा – नहीं – नहीं बेटा , मैं तुम्हें बेवकूफ कैसे बना सकती हूं ! तुम चाहो तो अभी मुझे खा सकते हो , लेकिन तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा । यही अच्छा होगा कि तुम मुझे बेटी के घर से आने के बाद खा लो । मैं एक नजर अपनी बेटी को देखना चाहती हूं । चीता ने कहा – ठीक है बुढ़िया , मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा , अब जाओ और जल्दी आना ।

बुढ़िया डरते हुए आगे बढ़ी , थोड़े ही दूर जाने के बाद बड़े-बड़े बालों वाला एक काला भालू उसके पास आया और जोर से गुर्राया । भालू ने कहा – ऐ बुढ़िया! मैं तुम्हें मार कर खा जाऊंगा , मुझे बहुत भूख लगी है । बुढ़िया ने फिर भालू से कहा कि – बेटा मेरा शरीर तो एकदम सूखा हुआ है , मांस इसमें है ही नहीं । तुम्हें मुझे खा कर क्या मिलेगा ? मैं अपनी बेटी के घर जा रही हूं , वहां से खा -पीकर मोटी – तगड़ी होकर जब वापस आऊंगी, तब मुझे तुम खा लेना । भालू ने कहा – तुम ये क्या कह रही हो ! तुम बचकर जाना चाहती हो ? मैं तुम्हारे बहकावे में नहीं आऊंगा । मैं तुम्हें अभी मार कर खा जाऊंगा । बुढ़िया ने कहा नहीं – नहीं बेटा , मैं भला तुमसे क्यों झूठ बोलूंगी , तुम मेरा विश्वास करो , मैं वापस जरूर आऊंगी और तुम्हें खाने में भी मजा आएगा , मैं तुम्हें विश्वास दिलाती हूं कि मैं तुम्हारे पास वापस जरूर आऊंगी । भालू ने कुछ सोचते हुए कहा – ठीक है बुढ़िया तुम वापस जरूर आना , मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा , जाओ अब तुम जल्दी जाओ । बुढ़िया मन ही मन सोच रही थी कि मैंने कैसे इन लोगों से छुटकारा पा लिया है ।

कुछ दूर आगे चलने पर बुढ़िया को एक खूंखार बाघ दिखाई दिया । बाघ ने दहाड़ते हुए कहा – ऐ बुढ़िया तुम कौन हो ? मैं तुम्हें खा जाऊंगा ! मुझे बहुत भूख लगी है । बुढ़िया ने फिर उसके सामने हाथ जोड़ते हुए कहा – बाघ बेटा अभी मुझे खाने से तुम्हें क्या मिलेगा मेरा शरीर तो सूख चुका है , इसमें अब सिर्फ हड्डियां ही हड्डियां है , मांस तो है ही नहीं । मैं अपनी बेटी के घर जा रही हूं , वहां पर मैं बढ़िया खा – पीकर , मोटी -तगड़ी होकर जब वापस आऊंगी , तब मुझे खा लेना । तभी तो तुम्हें खाने का आनंद मिलेगा । बाघ ने कहा – मुझे बहलाने की कोशिश मत करो । बुढ़िया ने कहा – मैं तुम्हें नहीं बहला रही बेटा , मेरे तो शरीर में ताकत ही नहीं है , मैं तुमसे भला दुश्मनी कैसे कर सकती हूँ । तुम मेरा विश्वास करो मैं एक न एक जल्दी ही तुम्हारे पास जरूर आऊंगी , तुम मेरा इंतजार करना । बाघ ने कहा – ठीक है , मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा , भूलना मत तुम जरूर आना वरना तुम्हारा अंजाम बहुत बुरा होगा , मैं तुम्हें जहां भी छुपी होगी वहीं से ढूंढ लूंगा ।

बुढ़िया मन ही मन मुस्कुराते हुए आगे बढ़ी और अपनी बेटी के घर तक जा पहुंची , घर में पहुंचते ही उसने अपनी बेटी को गले से लगाया और खूब रोई । फिर बेटी ने उसका मान – सम्मान किया और उसके खाने के लिए अच्छे-अच्छे पकवान बनाएं । इस तरह महीनों तक बुढ़िया अपनी बेटी और दामाद के साथ हंसी-खुशी रहने लगी । बुढ़िया तंदुरुस्त हो गई । 1 दिन बुढ़िया ने कहा कि – बेटी मुझे यहां पर आए हुए अब बहुत दिन हो गए हैं , अब मुझे वापस घर जाना चाहिए । बेटी ने जिद की , कि आप और कुछ दिन रहे , आप इतनी जल्दी हमें छोड़कर नहीं जा सकती । बेटी की जिद करने पर मां ने कहा – ठीक है , मैं सिर्फ 1 दिन और रुकूँगी और फिर अपने घर चली जाऊंगी । बेटी ने कहा – ठीक है मां ।

अगले दिन सुबह बुढ़िया उठ कर नहा – धोकर जाने की तैयारी करने लगी । बेटी ने भी उसके लिए तरह-तरह के पकवान बनाकर खिलाएं , लेकिन वह चिंता में डूबी हुई थी , उसको चिंता में देख कर उसकी बेटी ने पूछा – क्या है मां तुम बहुत उदास हो ? मैं तो कहती हूं कि , तुम यहीं पर हमारे साथ ही सदा के लिए रुक जाओ आखिर वहां अकेली रह कर क्या करोगी । वहां तुम्हारा कोई सहारा भी नहीं है इससे अच्छा है तुम हमारे पास ही रह जाओ । बुढ़िया ने कहा – नहीं लाडो नहीं , बेटी के घर रहना उचित नहीं है , मुझे घर ही जाना है । मुझे एक बात की बहुत चिंता है , लेकिन मैं तुम्हें यह बताना नहीं चाहती थी । मैं उस मुसीबत से कैसे पार पाऊंगी यही मैं सोचती रहती हूं । बेटी ने कहा – मां आप मुझे बताइए आपको क्या परेशानी है । मैं आपकी परेशानी को जरूर दूर कर दूंगी । मां ने बेटी से कहा कि – जब मैं तुम्हारे घर आ रही थी तो , जंगल के रास्ते में मुझे चीता , बाघ और एक भालू मिला था । उन्होंने मुझे खाने की कोशिश की बड़ी मुश्किल से मैंने उन्हें मनाया कि मुझे अभी मत खाओ , अभी मेरे शरीर में मांस ही नहीं है , मैं अपनी बेटी के घर जा रही हूं और वहां से मोटी – तगड़ी होकर जब आऊंगी तब मुझे खा लेना । अब वो लोग मेरा इंतजार कर रहे होंगे , अब मैं उनसे अपना पीछा कैसे छुड़ाऊँगी इसी बात की मुझे चिंता है । थोड़ी देर सोचने के बाद बेटी ने कहा कि – तुम चिंता मत करो मां , मेरे पास एक उपाय है अगर तुम मेरे कहे अनुसार काम करोगी तो यह मुसीबत टल जाएगी ।

उसकी बेटी ने एक बड़ा सा गोल मटका खरीद लाया और नीचे की तरफ दो छोटे छेद कर दिए और ऊपर की तरफ भी दो छोटे छेद कर दिए और उसने अपनी मां को कहा कि- मां आप इस मटके में बैठ जाइए नीचे के हिस्से आप अपने दोनों पैर निकालकर धीरे धीरे चलना और सामने के छेद से आप रास्ता देख सकते हैं । जैसे ही वह आपके सामने आए आप रुक जाना और उनके चले जाने के बाद धीरे-धीरे आगे बढ़ना ऐसा कहकर बेटी ने अपनी मां को मटके के अंदर बिठाया और ढक्कन बांध दिया और घड़े को धकेलते हुए कहा – ”चल रे घड़ा घाटे – घाट “, ” चल रे घड़ा खाटे – घाट ” घड़ा धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए जंगल में आया थोड़ी देर में उसके सामने गुजरते हुए बाघ ने कहा – ए मटके तुमने एक बुढ़िया को देखा है क्या ? उसने कहा था मैं आऊंगी लेकिन आज तक नहीं आई । घड़े ने कहा – ” बुढ़िया देखे न गुड़िया ,” चल रे घड़ा घाटे – घाट , चल रे घड़ा घाटे – घाट ” और और घड़ा लुढ़कने लगी । थोड़ी ही दूर चलने पर उसका सामना भालू के साथ हुआ , भालू ने अपने लंबे बाल लहराते हुए और गुर्राते हुए कहा – ए मटकी तुमने एक बुढ़िया को देखा है क्या ? मटकी से आवाज आई – ” बुढ़िया देखे ना गुड़िया , चल रे घड़ा घाटे – घाट ” और धीरे-धीरे वह आगे बढ़ गई ।

अंत में उसका सामना चीता के साथ हुआ चीता जोर से छलांग लगाकर उसके सामने आ गया और पूछा ऐ घड़े तुमने एक बुढ़िया को देखा है क्या ? जो लाठी टेककर चलती है , उसने कहा था कि मैं जल्दी ही आऊंगी लेकिन इतने दिन हो गए वह आज तक नहीं आई मटके ने कहा – ” बुढ़िया देखे ना गुड़िया , चल रे घड़ा घाटे – घाट , चल रे घड़ा घाटे- घाट ” । ऐसा करते हुए बुढ़िया जंगल से पार हो गई । जंगल के बाहर आते ही मटका फोड़ कर बुढ़िया बाहर आ गई और खुशी से झूमने लगी और फिर वह अपने घर पहुंच गई ।

शिक्षा :- कितनी भी विपरीत परिस्थितियां हो हमें अपना धैर्य नहीं खोना चाहिए तथा सदैव समस्याओं को हल करने के बारे में सोचना चाहिए ।

पारंपरिक छत्तीसगढ़ी लोककथा
पुरुषोत्तम साहू

New hindi story for kids । किस्मत मेहरबान तो गधा पहलवान

एक गांव में एक लड़का रहता था भोलाराम , तकरीबन 10 साल का , जैसा नाम वैसा ही काम , बहुत ही भोला – भाला और कमजोर बुद्धि का बालक , दुनिया की चतुराई से अनभिज्ञ । उसकी मां का निधन हो चुका था , उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली थी । उसकी सौतेली मां उसे अच्छे से संभालती थी । लेकिन कुछ ही दिनों बाद उसकी सौतेली मां के बच्चे हुए । धीरे-धीरे उस सौतेली मां का व्यवहार बदलने लगा और वह उसे तरह-तरह से प्रताड़ित करने लगी लेकिन वह लड़का बहुत भोला-भाला था उसे यह बात समझ नहीं आती थी । वह अपनी मां के बताए अनुसार ही चलता था उसके मन में अपनी मां के प्रति कभी भी द्वेष की भावना नहीं आई । घर पर ही रहता था और अपनी मां के साथ और अपने पिता के साथ काम करने में मदद करता था ।

कुछ सालों बाद उसके बाकी के भाई – बहन बड़े हो गए और वह लड़का जवान हो गया था । अब उसकी शादी करने की उम्र हो चुकी थी , वह गोरा और गठीले बदन वाला एक नौजवान बन गया था । पिता ने जब उसकी मां के सामने भोलाराम के विवाह की बात की तो , सौतेली मां ने सोचा कि जब इसका विवाह हो जाएगा और इसका परिवार बस जाएगा तब आज नहीं तो कल इसे जायदाद में हिस्सा भी देना पड़ेगा । इसलिए उसने उसे मारने का षड्यंत्र रचा उसके पिता बहुत भोले – भाले थे और दिन भर खेतों में काम करते रहते थे । इसलिए उनको इस बात की भनक नहीं लगी ।

एक दिन उस सौतेली मां ने लड्डू और पूरी बनाएं और एक पोटली में पूड़ी और लड्डू बांध कर जंगल के रास्ते अपने मामा के घर संदेश पहुंचाने के लिए बहाने भोलाराम को भेजने का उपाय किया । षड्यंत्र के तहत उसकी मां ने उसके लड्डू में जहर मिला दिया था उसने लड़के से कहा कि तुम्हें जब रास्ते में भूख लगेगी तब तुम इसे खा लेना और आधी रोटी और लड्डू अपने मामा के घर ले जाना । लड़का अपनी मां की बात मानकर सुबह – सुबह ही नहा धोकर तैयार होकर पोटली लेकर अपने मामा के घर संदेशा पहुंचाने के नाम से घर से निकल पड़ा । चलते – चलते वह जंगल तक पहुंच गया । गर्मी का दिन था इसलिए उसे बहुत ज्यादा थकान लग रही थी ।

जब वह जंगल के बीच में पहुंचा तो वह बहुत ही थक चुका था । उसने सोचा कि यहां पर थोड़ी देर आराम कर लेते हैं । उसने एक छोटे झरने के किनारे बड़े से पत्थर पर अपनी पोटली रखी और पत्थर की खोह में आराम करने लगा थोड़ी देर बाद वहां एक हाथी आया । हाथी लड्डू की सुगंध पाकर पोटली के पास पहुंचा । हाथी ने सूंड से उस पोटली को खोल दिया और उसमें के लड्डू और पूड़ी खा लिए । इस बीच उस लड़के की नींद भी खुल गई और उसने देखा कि वह हाथी उसके खाने को बर्बाद कर रहा है , गुस्से में आकर उसने हाथी को मारना शुरू किया । हाथी ने उसे अपनी सूंड में लपेट लिया वह अपने मुट्ठी से उसके सिर पर बार – बार वार कर रहा था । उधर से राजा की सेना उस हाथी का पीछा करते हुए आ रहा था और जोर-जोर से चिल्ला रहे थे । उन्होंने देखा कि एक लड़का हाथी को कैसे मार रहा है , थोड़ी ही देर में वह हाथी जहर के प्रभाव से गिर पड़ा और थोड़ी ही देर में उसकी मृत्यु हो गई ।

सिपाही चिल्लाने लगे कि यह बहुत बलवान लड़का है ,जिसने अपने मुक्के के प्रहार से इस विशालकाय हाथी को मार दिया और वे नाचने लगे । सिपाहियों ने उस लड़के को बताया कि यह राज दरबार का हाथी है कुछ दिन पहले ही पागल हो गया और राज दरबार से भागकर लोगों को घायल कर रहा था । इसलिए हम इसे पकड़ने आए थे राजा ने इस हाथी को मारने के आदेश दिए हैं । इस हाथी ने लोगों को बहुत परेशान कर रखा था लेकिन तुमने इसे अपने बाहुबल से मार दिया , तुम बहुत महान हो ।

सिपाहियों ने कहा कि राजा बहुत खुश होंगे, तुम्हें बहुत सारे इनाम मिलेंगे , तुम अभी हमारे साथ चलो । लड़का सिपाहियों के साथ चला गया उसने सोचा कि मुझे इनाम में जो धन मिलेगा उसे मैं अपने घर में ले जाऊंगा तो मेरे माता और पिता बहुत ही खुश होंगे । सिपाहियों के साथ वह लड़का राजदरबार में पहुंचा । सिपाहियों ने सारी बात राजा को बता दी , राजा बहुत खुश हुए और उसे 100 सोने की स्वर्ण मुद्रा इनाम के रूप में प्रदान की ।

राजा ने पूछा कि तुम क्या काम करते हो ? लड़के ने कहा – मैं अपने पिता के साथ खेतों में काम करता हूं । राजा ने कहा – तुम बहुत बहादुर हो , तुम बहुत ही शक्तिशाली हो , तुम्हें हमारे दरबार में एक वीर योद्धा के रूप में होना चाहिए । लड़का यह सुनकर बहुत ही खुश हुआ और उसने राजा की बात मान ली और वहां पर सैनिक का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया । उसकी मेहनत को देखकर राजा ने उसे सेना की एक टुकड़ी का सेनापति बना दिया । इधर बहुत दिनों तक उस लड़के की कोई खोज – खबर नहीं थी । इसलिए उसके परिवार वालों ने उसे मृत मान लिया और उसकी सौतेली मां मन ही मन बहुत ही खुश होने लगी ।

थोड़े ही दिनों बाद एक शेर ने राजा के राज्य में उत्पात मचाना शुरू कर दिया और लोगों को मारना शुरू कर दिया । राजा ने तुरंत ही अपनी सेनाओं के सेनापतियों को आदेश दिया कि उस शेर को ढूंढ कर मार दिया जाए । भोलाराम भी अपनी टुकड़ी के साथ उस शेर को पकड़ने के लिए जंगल में छान मारने लगा । एक दिन जब वह अपनी सेना के साथ शेर को ढूंढ रहा था तब उसी जंगल में एक किसान मिला । किसान ने उससे कहा कि – सेनापति जी मेरा एक बैल घर से भागकर घने जंगल में आ गया है , मैं उसे तलाश करते -करते थक गया हूं । अगर आप लोगों को वह बैल मिल जाए तो उसे आप अपने पास रख लीजिएगा और मेरे गांव में मुझे सूचना भिजवा दीजिएगा ।

सेनापति ने किसान से कहा कि – आप चिंता मत करिए अगर वह बैल हमको मिला तो हम उसे अवश्य ही आप तक पहुंचा देंगे , अब आप अपने घर चले जाइए अकेले जंगल में भटकना ठीक नहीं है । रात होने पर वे पेड़ों के ऊपर सो जाते थे और कुछ सैनिक नीचे तंबू बनाकर निगरानी करते थे । उसी दिन रात को सेनापति को एहसास हुआ कि , कोई जानवर उसके पेड़ के नीचे खड़ा है , उसने ध्यान से देखा और कहा अरे यह तो किसान का बैल है । रस्सी का फंदा लेकर भोलाराम ने उसके ऊपर छलांग लगा दी और उसकी गर्दन को रस्सी से लपेट दिया सभी सैनिक भी उसके पीछे-पीछे उस पर टूट पड़े । रात के अंधेरे में भगदड़ मच गई सैनिकों ने बड़े – बड़े जाल फेंक कर उसको पकड़ लिया ।

सभी सैनिकों ने मशाल जलाई तब उस लड़के ने देखा , अरे यह तो खूंखार शेर है ! उसकी बोलती बंद हो गई लेकिन सारे सैनिक उसकी जय-जयकार करने लगे । शेर को पिंजरे में कैद कर राजा के पास लाया गया । भोलाराम के इस कारनामे को देखकर राजा अत्यंत ही प्रसन्न हुए , उन्होंने उसे अपने राज्य का मुख्य सेनापति घोषित कर दिया । उसकी बहादुरी को देख कर अतिसुन्दर राजकुमारी इतनी प्रसन्न हुई कि उन्होंने उससे विवाह करने की घोषणा कर दी ।

राजा ने भी खुश होकर उनके विवाह को मंजूरी दे दी । इस तरह राजकीय ठाठ – बाठ से उसका विवाह संपन्न हुआ । वह अपनी नई – नवेली दुल्हन को लेकर सैनिकों के बेड़े के साथ अपने गांव की ओर रवाना हुआ । उसके गांव के लोग उसे देखकर हक्के – बक्के रह गए । जब वह अपने घर के पास जाकर खड़ा हुआ तो उसकी मां और पिताजी उसको देखकर सन्न रह गए । सौतेली मां के पैरों तले तो मानों जमीन ही खिसक गई ।

उसके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला । लड़के ने अपनी सारी बात अपने परिवार वालों की बताई और कहा कि आज से हम राज महल में रहेंगे , मैं आप सबको लेने के लिए आया हूं । यह बात सुनकर उसकी सौतेली मां को मन ही मन बहुत पश्चाताप हुआ और अपने आपको कोसने लगी और खूब रोई , उसने उसके साथ राजमहल जाने के लिए इंकार कर दिया । लेकिन उस लड़के की बार-बार जिद करने पर वह जाने के लिए मान गई और उसके बाद उसने कभी भी उस लड़के और उसकी पत्नी के बारे में कभी भी अपने मन में बुरे विचार नहीं लाएं इस तरह सभी लोग राजमहल में हंसी – खुशी रहने लगे ।

पारंपरिक लोककथा
पुरुषोत्तम साहू