कोई दरवाजे पर आकर कह रहा है

कोई दरवाजे पर आकर कह रहा है कि,

वो घर, अपना पालना चाहता है,
कहता है, जी तोड़ मेहनत करूंगा,
साहब, मुझे कोई, कुछ तो काम दें।

वो घर, अपना बचाना चाहता है,
कहता है, घर की नींव डालना जानता हूं,
साहब, नींव डलवाने का ही काम दे दें।

वो घर, अपना सजाना चाहता है,
कहता है, घर बनाना, सजाना जानता हूं,
साहब, घर को सजाने का ही काम दे दें।

वो घर, अपने अर्थ सुख चाहता है,
कहता है, यहां नहीं तो बाहर चला जाऊंगा,
साहब, कहीं भी, किसी भी जगह भेज दें।

वो घर, अपने बच्चे शिक्षित चाहता है,
कहता है, भीख नहीं चाहिए, मेहनत बेचूंगा,
साहब, ईमान छोड़कर, कुछ भी करवा दें।

वो घर, परिवार का भविष्य चाहता है,
कहता है, दूर रहकर, मुझे कुछ भी हो जाए,
साहब, शिकायत नहीं, कमाई घर दे देना।

दरवाजे पर, इतनी बड़ी बातें कौन कर रहा है,
साहब वो कहता है, खाली पेट ‘ मैं मजदूर हूं’।

बाघों पर हिंदी कविता

हासिल जिसको खिताब,
विश्व दिवस उसका आज,
विश्व की 70 फ़ीसदी,
आबादी भारत में रहती।

एक समय ऐसा था,
अस्तित्व पर संकट था,
धीरे धीरे बढ़ता क्रम
अब रहा न कोई भ्रम।

भारत में इनकी कुल,
संख्या 2967 हो गई,
50 से ज्यादा संख्या,
टाइगर रिजर्व हो गई,

वन पारिस्थितिकी तंत्र में,
सबसे अहम भूमिका रखते,
उनके स्वस्थ, सुरक्षित रहते,
जैव विविधता होती खुशहाल,

आओ मनाले मिलकर आज,
विश्व बाघ दिवस मन से आज।

सहपाठी की सीख

 बात थोड़े समय पहले की है, वर्ष 1997 माह फरवरी का, जब मैं (ऋषि कुमार दीक्षित) आगरा के एक वोकेशनल इंस्टीट्यूट से बीएससी (कम्प्यूटर) कोर्स के द्वितीय सेमेस्टर में अध्ययनरत था। क्लास में सभी मिलजुल कर बैठा करते थे।

छात्र-छात्राएं आपस में बैठकर विषय से संबंधित समय-समय पर चर्चा किया करते थे। कई बार ऐसा समय आया, जब मैं अपनी सहपाठी के साथ चर्चा करता था।

एक बार जब मैं अपनी सहपाठी के साथ चर्चा कर रहा था, तो मन में उसको चॉकलेट (बार- 1,रुपए 10) देने का विचार आया, जो मैंने अपने स्वयं के खाने के लिए रखी थी, बैग से निकालकर उसको देने के लिए हाथ बढ़ाया। 

लगभग चार-पांच सेकंड सोचने के बाद हुए वार्तालाप का विवरण - 
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सहपाठी – क्या यह चॉकलेट मेरे लिए लेकर आए हो?
ऋषि – हां।
सहपाठी – चॉकलेट के पैसे कहां से आए?
ऋषि – मुझे मेरे पिताजी ने दिए हैं।
सहपाठी – पैसे तुम्हारी पढ़ाई के लिए दिए होंगे न।
ऋषि – हां।


सहपाठी – क्या तुमको इस प्रकार से चॉकलेट में पैसे खर्च करने चाहिए? पिता के पैसे को इस तरह बरबाद नहीं करना चाहिए। जब खुद कमाओगे तो जानोगे न।
ऋषि – —–
सहपाठी – बताओ न।
ऋषि – तुमने सही कहा।
सहपाठी – मैं इसे नहीं ले सकती।
ऋषि – ठीक है, आगे से ध्यान रखूंगा।
सहपाठी – कोई बात नहीं।चलो अपने विषय पर ध्यान देते हैं।

मुझे ऐसी सीख मिली जिसको मैनें अपने जीवन में अपनाया। सच में स्त्री बहुत ही महान होती है। मेरा उन सभी माता पिता को नमन जो अपने बच्चों में इतने अच्छे संस्कार भरते है। मेरी उस सहपाठी को भी मैं नमन करता हूं, जिसने मुझे जीवन जीने का तरीका बताया। कभीभी माता पिता के पैसे को अनावश्यक खर्च नहीं करना चाहिए। कितनी मुश्किल से धन आता है।

(यदि मेरी इस घटना से किसी को कोई दुख पहुचा हो, कृपया अवगत करा दें, मैने केवल स्त्री की महानता का वर्णन किया है)।