शब्द ही सुर शुलभ मेरा

शब्द ही सुर सुलभ मेरा
शब्द ही साज है मेरा।
अर्चना शब्द की करता
यही अंदाज है मेरा।।
शब्द आधार है मेरा
शब्द ही प्यार है मेरा।
अर्चना शब्द की करता
शब्द ही संसार है मेरा।।
शब्द को साधना दुष्कर
शब्द की साधना दुष्कर
शब्द स्वरूप केहरी का
शब्द को बांधना दुष्कर
कठिन है शब्द में रमना
कठिन ले शब्द को थमना
शब्द संसार में कितना
दुष्कर शब्द ले चलना

हाँ कहूँगा भगौड़ा तुम्हें

हां कहूंगा भगौड़ा
तुम्हें।
भागा था तूं/भागता रहा तूं


आधी रातकडड़कती बिजली और
मूसलाधार बारिश में भी
ममता को छोड़ जंजीर बंधी
जेल में
छबड़ी के खेल में।


हां फिर भागा था
भागा था दहलीज लांघते हुए
विष स्तनों
के पान को आतुर
प्राण ही पीने पूतना के।


भागा था दड़ाछट
कालीदह
गेंद के बहाने।
नाग भगाने
रोती बिसूरती आंखों को
धक्के मार।


भागना रहा निरंतर
तेरा व्यवहार
तेरा व्यापार ।


भाग गया तूं
रोते रंभाते गाय बछड़ों से
नजरें चुरा
ग्वाल बालों को बहला फुसला
बहुत ही क्रूर बन
अक्रूर के साथ।
तड़पता गोकुल को धकिया
सीधे मथुरा।


और बहलाने को दिया नही कोई
मंत्र
गोपबालाओं को
कुंज गलिन की युग्म लताएं
जो सुनती थी तान, बांस की
बांसुरी की
उस अधर रागिनी को छोड़
अधर


थी की नहीं पर
सुना हूँ कि वो जो थी राधा
उसकी आंखों के पानी का बहाव
भी नही रोक पाया था।


भाग कर ही
पोंछी होगी शायद तुमने भी
अपनी गीली आंख
तुमने मथुरा की किसी अंधी गली में।