बहुत बनाया मंदिर मस्जिद

बहुत बनाया मंदिर मस्जिद
गुरुद्वारे और गिरजाघर
कहि प्रेम की अजब निशानी
कही बसाया मूर्तियों का शहर
छुद्र विषाणु के आगे बेबस
मानवता सिरमौर कहाँ है
मानव के सेवा का मंदिर
स्नेह शांति का ठौर कहाँ है…

बन्द कफ़न के भीतर देखो
रक्त हरा है या फिर लाल
कौन मर रहा हिन्दू या मुस्लिम
मजहब पर मचे कितने बवाल
मानव के बंटवारे करते
बन्द पड़े सारे दरवाजे
कौन सुनेगा क्रंदन अपना
किसे लगाए हम आवाजे
थम कर धीमी हुई हलचलें
आबादी का शोर कहाँ है
मानव के सेवा का मंदिर
शांति स्नेह का ठौर कहां है…

जीवन के हर कदम के साथी
रास्तों के वो शीतल छाँह
समेट लिए कितने पेड़ों को
लालच ने फैला अपने बाँह
दूभर हुआ अब प्राणवायु भी
दिन कैसे अब शेष रह गए
खूब बहाया जल की रेली
अब केवल अवशेष रह गए
सोचो अपनी नादानी को
कल वाली वो भोर कहाँ है…..

चलो मानवता के लिए एक दीप जलाये


दीप जले
अंधकार चीरकर
मन की पीड़ा दूरकर
उल्लसित मन
सुमन तरंग
ज्योतिर्मय जग में
भीनी सुगन्ध
दीप जले ,दीप जले!
अलसाई खेतों में
मेहनत का प्रतिफल हो
बंगले की आभा से
झोपड़िया रोशन हो
मानवता सजोर रहे
हिन्दू न मुस्लिम हो
माटी का नन्हा लोंदा
हाथों में साथ बढे
दीप जले, दीप जले!
घर की खिचडिया सही
भले न पकवान बने
तरसे न बचपन फिर
भूख न शैतान बने
नन्ही सी बिटिया की
आभा न आंच आये
खुशीयो को अपनी
दूजा न रो पाए
दीप जले,दीप जले!
बम और लरियो की
इतनी न धमाके हो
उजड़े न घर बार कोई
अपनो की यादें हो
सरहद सुकून मिले
अमन का बिसाते हो
हाथ बढ़े, गले मिले
दीप जले, दीप जले!
सहमी सी धरती में
अपनों का क्यो रोना
जीत जाए मानवता
हारे अब कोरोना
चिंतन मन सद्प्रयास
जन मन का साथ मिले
दीप जले-दीप जले…