वसुंधरा हिंदी कविता गावस्कर कौशिक

(कोरोना काल)

प्रभु ने सुन्दर सृष्टि का किया सृजन
कर न सके हम उनका पूजन
मानव मन में जगी अभिलाषा
भूल गये प्रकृति तंत्र की परिभाषा
अधिकारों का अपने कर अतिक्रमण,
बर्बर किया मनुज ने धरा का शोषण
फिर उस शाशवत महाप्राण ने ,
परिवर्तन का ऐसा खेल रचाया
दूर कर सर्वत्र प्रदूषण,
किया धरा का नवपोषण

क्षीर सागर में लगा के डुबकी
वसुंधरा निकली करके नव श्रृंगार
स्वर्ण आभूषित गले की हार
स्वर्णिम रजत बूंदों सी बहती ,
स्वच्छ गगन में मेघाकार
देते यही सन्देश, ये नीले नीले अम्बर
लो धरा फिर संभलो तुम,दे रहा दिगम्बर………..

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